पत्रिका इतिहास के झरोखों से--कोई भी बीमारी आज तक भारत में नहीं पनपी, विदेश से ही होता है प्रत्येक बीमारी का संक्रमण
भरतपुर. लॉकडाउन का भरतपुर में व्यापक असर देखा जा रहा है, लेकिन यह पहली बार नहीं है कि जब लोगों ने स्वेच्छा से खुद को घरों में कैद किया है। बता उस समय की है कि जब ब्रिटिश सरकार की वर्ष 1894-95 काबुल की लड़ाई में भरतपुर की सेना भेजी गई। वर्ष 1899-1900 में बगावत बक्सर (चीन) के समय राजा मुकंद सिंह के नेतृत्व में सेना भेजी। 18 सितंबर 1914 को भरतपुर की सेना मोमवासा (पूर्वी अफ्रीका) पहुंची। वर्ष 1919 में युद्ध शांति पर वापस भरतपुर पहुंची। भरतपुर की इम्पीरियल सर्विस कार्पस को मेसोपोटेमियां, फ्रांस, मारसेसीज युद्ध भूमि में भेजा गया था। अनेक प्रकार की विषैली गैसों के प्रकोप तथा रक्तचाप के कारण इस युद्ध ने यूरोपीय देशों में बीमारियां फैला दी। युद्ध के बाद जब भारतीय सैनिक लौटे तो उन जीवाणुओं ने यहां भी प्लेग फैला दिया। सन् 1920 ईस्वी में इसका इतना भयानक प्रकोप हुआ कि घरों के दरवाजों पर ताले लगा दिए गए। शवों को उठाने वाले भी उपलब्ध नहीं होते थे। उपलों की गाडिय़ों में डालकर श्मशान घाट पहुंचाया जाता था। वहां भी जलाने को स्थान नहीं मिलता था। बदन में ज्वर तथा गिल्टी के रूप में प्लेग के लक्षण प्रकट होते थे। इसके कारण दो दिन में ही मृत्यु हो जाती थी। पांच प्रतिशत ही रोगी बच पाते थे। इस समय इसकी कोई औषधि न थी और गांवों में तो कोई डॉक्टर भी उस समय उपलब्ध नहीं था। सिर्फ 'औषधं जाह्नवीतोयं वैद्यो नारायणो हरि: का ही आश्रय था। भरतपुर का बाजार तो 1735 में ही बस गया था। एक बार अहमद शाह अब्दाली ने भी मथुरा, भरतपुर इलाके में आकर घुसपैठ की कोशिश की, लेकिन उस समय भी यह बीमारी फैली हुई थी, उस परिणाम यह हुआ कि वह यहां से भाग गया। प्लेग से बचाव के लिए इमली को सहारा बताया गया। प्राचीन समय के जानकार ही बता सकते हैं कि भरतपुर से आगरा, आगरा से दिल्ली तक सड़क किनारे बड़ी संख्या में इमली के पेड़ हुआ करते थे। उस समय रियासत ने इस बीमारी से बचाव के लिए इसकी औषधि के लिए पौधरोपण कराया था। कोरोना एक वैश्विक माहमारी जिसने दुनिया भर के देशों को हिलाकर रख दिया है। विश्व के भारत समेत कई देश इसके संक्रमण के चपेट में हैं कोरोना वायरस चीन की देन है जो वहां के वुहान शहर से शुरू होकर एक महीने के अंदर 20 देशों में फैल गया। हकीकत यह है कि कोई भी बीमारी आज तक भारत में नहीं पनपी है। इतिहास गवाह है कि पुराने समय से विदेशों से ही इन बीमारियों का संक्रमण हमारे देश तक फैलता रहा है। कोरोना से पहले भी कई बार माहमारी घोषित की चुकी है और कई ऐसी बीमारियां हैं जो विदेश से भारत आईं और यहां के लिए तबाही का मंजर बन गईं। ऐसा भी बताते हैं कि प्लेग सबसे पहले चीन के चूहों में हुआ था। प्लेग में भी कफ और बुखार की शिकायत होती थी। रातों रात लोग अपना शहर छोड़कर कहीं और चले गए थे। इस बीमारी की वजह से पूरे देश में बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।
यह लॉकडाउन डराने वाला नहीं, महामारी को हराने की हिम्मत दिखा रहा
ये जन लॉकडाउन डराने वाला नहीं, हिम्मत दिखाने वाला है। क्योंकि भागदौड़ भरी जिंदगी में एक जगह टिक कर बैठने के लिए धैर्य चाहिए। जिंदगी का दूसरा सबसे बड़ा बंद अब देख रहा हूं। अंतर ये है कि पुराने समय में वह शहर पर दुखों का पहाड़ था। तब डर के मारे घरों में दुबके थे, आज एक वायरस को डराने और हराने के लिए घरों में स्वैच्छा से रह रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पहली बार ऐसा जनता बंद देखा जिसने हर देशवासी में जज्बा भरा हुआ है। आज लोग उस दिन की भांति डरे हुए नहीं। हमने विश्व को एकजुटता का जो संदेश दिया है, इस पर पूरे विश्व को गर्व करना चाहिए। मैं अपने बच्चों को सैकड़ों साल पहले की प्लेग बीमारी की डराने वाली कहानियां ही सुनाता था। जीवन के इस पड़ाव में गर्वित करने वाले पल भी जी लिए।
रामवीर सिंह वर्मा
वरिष्ठ साहित्यकार सूरजमल नगर भरतपुर