स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दामोदार दास टावरी का शुक्रवार की सुबह यहां निधन हो गया। वे 104 वर्ष के थे और अपने आखिरी समय पर पूरी तरह सक्रिय रहे।
राजनांदगांव. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दामोदार दास टावरी का शुक्रवार की सुबह यहां निधन हो गया। मूलत: महाराष्ट्र के वर्धा जिले के रहने वाले और आजादी के बाद डोंगरगांव में बस गए टावरी ने राजनांदगांव के ममतानगर स्थित अपने बेटे के निवास में अंतिम सांस ली। वे 104 वर्ष के थे और अपने आखिरी समय पर पूरी तरह सक्रिय रहे।
वे राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव में आकर बस गए
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टावरी का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा जिले के आस्टी तहसील के किन्हाल गांव में हुआ था। आजादी के आंदोलन में वे पूरी शिद्दत से शरीक हुए और वर्धा सेवाश्रम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सानिध्य में आने के बाद खुद को देश के लिए समर्पित कर दिया। आजादी के बाद दामोदार टावरी ने महाराष्ट्र को छोड़ दिया और वे राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव में आकर बस गए।
मिली थी फांसी की सजा
अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलन में शरीक हुए सेनानी टावरी को फांसी की सजा सुनाई गई थी। टावरी के पुत्र रामदेव टावरी ने बताया कि बाद में जवाहरलाल नेहरू के प्रयासों के बाद उनकी सजा कम कर दो साल कर दी गई। उन्होंने यह सजा काटी।
देश के सभी प्रधानमंत्री के हाथों सम्मानित
सेनानी टावरी का देश के तकरीबन सभी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने सम्मान किया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनको ताम्रपत्र दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने स्वर्ण पत्र से सम्मानित किया था। अविभाजित मध्यप्रदेश और फिर छत्तीसगढ़ के सभी मुख्यमंत्रियों के हाथों सेनानी टावरी सम्मानित हुए।
उम्र को हरा दिया था
सेनानी टावरी 104 साल जीए। उम्र के इस पड़ाव में भी वे अपने दैनिक काम के लिए किसी पर आश्रिम नहीं हुए। वे अपना पूरा काम खुद करते थे। टावरी अपने पीछे पत्नी कस्तूरी देवी टावरी, भाई फत्तेलाल टावरी, दो बेटों श्यामसुंदर टावरी व रामदेव टावरी और दो बेटियों सरला देवी व मोहनी देवी सहित भरा भूरा परिवार छोड़ गए हैं।