झालावाड़ हादसे से भी नहीं लिया सबक; समसा और शिक्षा विभाग के बीच पिस रहा सिस्टम प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों की जान भगवान भरोसे है। झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद शिक्षा विभाग ने भले ही पूरे प्रदेश में जर्जर स्कूलों का सर्वे कराकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली हो, […]
प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों की जान भगवान भरोसे है। झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद शिक्षा विभाग ने भले ही पूरे प्रदेश में जर्जर स्कूलों का सर्वे कराकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली हो, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद डरावनी है। सर्वे में सामने आया है कि प्रदेश में 5667 स्कूल पूरी तरह असुरक्षित हैं और भवन का उपयोग करना खतरनाक है। इन खतरनाक स्कूलों की मरम्मत के लिए विभाग ने 20 हजार करोड़ का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन राज्य सरकार ने बजट में ऊंट के मुंह में जीरा देते हुए मात्र 500 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। शिक्षा विभाग भले ही बजट आवंटन को लेकर पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस नाकाफी बजट के कारण आने वाले मानसून में भी मासूम बच्चों को मौत के साए में पढ़ाई करनी पड़ेगी।
स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का भी टोटा है। प्रदेश के 17 हजार 109 शौचालयों को जर्जर घोषित किया है, जबकि 29 हजार 93 शौचालयों को मरम्मत की दरकार है। हाल ही में मुद्दे पर न्यायालय में सुनवाई हुई थी और अधिकारियों से सवाल-जवाब किए गए थे। जानकारों का मानना है कि सिर्फ शौचालयों की मरम्मत के लिए ही करीब 1000 करोड़ रुपए की जरूरत है, ऐसे में 500 करोड़ के कुल बजट से क्या-क्या सुधरेगा, यह बड़ा सवाल है।
प्रदेश में जब भी कोई स्कूल हादसा होता है, तो सबसे पहले शिक्षा निदेशालय और स्कूल स्टाफ पर गाज गिरती है। जबकि वास्तविकता यह है कि स्कूलों की मरम्मत से लेकर बजट प्रस्ताव, आवंटन और भुगतान तक की पूरी जिम्मेदारी समसा (समग्र शिक्षा अभियान) की है। जर्जर भवनों की पहचान करना, बजट पास कराना और अत्यधिक जर्जर होने पर बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करना समसा का काम है। शिक्षा निदेशालय केवल जर्जर स्कूलों की जानकारी देकर बजट का प्रस्ताव मांग सकता है।