केंद्रीय बजट के बाद अब सबकी निगाहें राजस्थान के बजट पर हैं। टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा के उद्यमियों ने मुख्यमंत्री को उनकी पुरानी बजट घोषणा याद दिलाते हुए सवाल उठाया है कि आखिर राज्य स्तरीय ग्राउंड वाटर बोर्ड कब बनेगा? मुख्यमंत्री ने बजट में इस बोर्ड के गठन की घोषणा की थी, लेकिन धरातल पर अब […]
केंद्रीय बजट के बाद अब सबकी निगाहें राजस्थान के बजट पर हैं। टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा के उद्यमियों ने मुख्यमंत्री को उनकी पुरानी बजट घोषणा याद दिलाते हुए सवाल उठाया है कि आखिर राज्य स्तरीय ग्राउंड वाटर बोर्ड कब बनेगा? मुख्यमंत्री ने बजट में इस बोर्ड के गठन की घोषणा की थी, लेकिन धरातल पर अब तक एक ईंट नहीं रखी गई। नतीजा यह है कि प्रदेश का उद्योग केंद्र सरकार (सीजीडब्ल्यूए) के कड़े नियमों, भारी-भरकम 'बहाली शुल्क' और लालफीताशाही के जाल में फंसकर रह गया है।
उद्यमियों का कहना है कि अगर राज्य का अपना बोर्ड होता, तो उद्योगों के विस्तार और नई इकाइयों की स्थापना में आने वाली बाधाएं दूर हो सकती थीं, लेकिन सरकार की सुस्ती ने उद्योगों की रफ्तार रोक दी है।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय (सीजीडब्ल्यूए) का 24 सितंबर 2020 का वह नोटिफिकेशन उद्यमियों की मुसीबत बन गया है। इसके तहत सभी पुरानी और नई औद्योगिक इकाइयों पर भारी 'ग्राउंड वाटर बहाली शुल्क' लगा दिया गया है। पानी निकालने के लिए अब मान्यता प्राप्त कंसल्टेंट से इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट तैयार करवाना अनिवार्य है। नियमों की जरा सी अनदेखी पर भारी जुर्माने का प्रावधान है।
भीलवाड़ा के उद्यमियों ने तर्क दिया है कि ग्राउंड वाटर का उपयोग हर राज्य की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। राजस्थान की स्थिति पंजाब या बंगाल जैसी नहीं है। यहां सतही पानी या बारहमासी नदियां न के बराबर हैं। उद्योग पूरी तरह से अंडरग्राउंड वाटर पर ही निर्भर हैं। ऐसे में केंद्र के एक समान नियम राजस्थान के उद्योगों के लिए व्यावहारिक नहीं हैं। जबकि उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और गोवा सरकार ने अपना बोर्ड बना रखा है। वही राजस्थान की स्थिति यह है कि घोषणा के बावजूद फाइलें धूल फांक रही हैं।
भीलवाड़ा के औद्योगिक संगठनों ने मांग की है कि आगामी राज्य बजट में सरकार अपनी पुरानी घोषणा को अमलीजामा पहनाए।