
फूलिया कलां।
यह साल कैसा रहेगा। इस बार फसल यानी जमाने का रूख क्या रहेगा। अकाल पड़ेगा या सुकाल। हर साल मकर संक्रांति पर धनोप गांव में होने वाला दड़ा महोत्सव में ग्रामीण इसी के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं। बरसों से चल रहे आपसी मेल-मिलाप के प्रतीक इस खेल को देखने आसपास गांवों से हजारों लोग जुटते हैं। इस दौरान सभी दुकानें बंद रहती है।
इस बार सोमवार को खेले जाने वाला दड़ा महोत्सव की तैयारियां पूरी कर ली गई है। गढ़ चौक के बीचो-बीच कल्याण धणी को साक्षी मानते हुए ग्रामीणों द्वारा खेला जाने वाला यह खेल सद्भाव के साथ रोमांच, शौर्य व मनोरंजन का मेल भी है। धनोप के सत्येंद्र सिंह राणावत का कहना है कि यह खेल आज भी दूरदराज तक चर्चित है। खेल शुरू होने से पूर्व ग्रामीणों द्वारा 7 किलो वजनी गेंद (दड़े) को गढ़ में से निकालकर चौक में लाया जाता है। शाहपुरा रियासत के पूर्व शासक सरदार सिंह के समय से यह महोत्सव हो रहा है। ढाई घंटे तक लगातार खिलाडिय़ों को उत्साहित करने के लिए छत ऊपर बैठे दर्शक ताने मार कर हौसले मजबूत करने में लगे रहते हैं। अगर एक भी खिलाड़ी नीचे गिर जाता है तो बाकी सभी खिलाड़ी खेल को छोड़कर उसकी कुशलक्षेम पूछने में लग जाते हैं। फिर दड़े के ऊपर पिल पड़ते हैं।
ऐसे बनती है टीमें और परिणाम.
इस खेल में भी दो दल होते हैं। यह टीमें परंपरानुसार तयशुदा मोहल्ले के आधार पर बनी हुई है। जिसमें ऊपर का पाड़ा व निचला पाड़ा के दो दल बने हुए हैं। खिलाडिय़ों को खेल समाप्ति के बाद गढ़ की ओर से गुड़ तथा पालीवाल बोहरा समाज की ओर से गुड़ प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। खेल-खेल में यदि दड़ा पूर्व जागीदार के हवेली की ओर जाता है तो वर्ष का चक्र शुभ एवं पश्चिम दिशा में फकीर मोहल्ले की ओर गोल होता है तो अशुभ माना जाता है। वहीं खेल के दौरान किसी भी दल द्वारा गोल नहीं होने पर दड़ा के गढ़ में वापस चले जाने को मध्यम वर्ष माना जाता है। यह निष्कर्ष आज भी क्षेत्र में प्रचलित और विश्वसनीय माना जाता है।
शक्तिपीठ धनोप माता का मानते हैं आशीर्वाद
दड़े को अपनी ओर खींचने के लिए गांव के बच्चे से बुजुर्ग तक पूरी ताकत लगाते हैं। इस खेल को यहां के बाशिंदे शक्तिपीठ धनोप मां का वरदान मानते हैं। मंदिर धनोप माता ट्रस्ट अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह राणावत व सरपंच मिश्री लाल माली के अनुसार आयोजन के प्रति ग्रामीणों में गजब का उत्साह है।
जय कल्याण धणी की रहती है गूंज
दड़ा महोत्सव के दौरान ग्रामीणों में जबरदस्त जोश दिखाई देता है। इस दौरान ग्रामीण जय कल्याण धणी तथा जय धनोप माता के जयघोष के बीच ग्रामीणों के दोनों दल आमने-सामने धकेलना शुरू कर देते हैं।