
भीलवाड़ा।
प्रदेश में भाजपा की सरकार होते हुए भी सीधे तौर पर किसानों से नहीं जुड़ पाई। प्रदेश के कई केन्द्रीय सहकारी बैंक, सहकारी भूमि विकास बैंक, होलसेल सहकारी उपभोक्ता भण्डार तथा कृषि उपज मण्डी में चुनाव तक नहीं कराए गए। ऐसे में इन संस्थाओं में प्रशासक लगे रहे। किसानों व व्यापारियों को सीधे तौर पर जनप्रतिनिधियों से लाभ मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह उठाना पड़ा कि ऋण माफी योजना सही रूप से लागू नहीं हो सकी। प्रदेश के कई केन्द्रीय सहकारी बैंकों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। प्रदेश की कुछ सहकारी संस्थाओं में चुनाव न्यायालय के दखल के बाद हो पाए। कई जिले ऐसे हैं, जहां पिछले कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव कराने की किसी भी जनप्रतिनिधि ने पहल नहीं की। कांग्रेस इसके पीछे भाजपा सरकार में हार का डर मानती है, तो भाजपा कहना है कि चुनाव कराना सरकारी मशीनरी का काम है।
यह है भीलवाड़ा की स्थिति
केन्द्रीय सहकारी बैंक (सीसीबी)
बैंक में कांग्रेस जिलाध्यक्ष रामपाल शर्मा अध्यक्ष थे। उन्होंने नगर विकास न्यास अध्यक्ष मनोनीत होने पर इस पद से इस्तीफा दे दिया था। शेष कार्यकाल वरिष्ठ उपाध्यक्ष भंवरू खां को बैंक की जिम्मेदारी सौंपी गई। बाद में चुनाव के माध्यम से ३० सितम्बर २०१४ तक भंवरू खां ने कार्यकाल पूरा किया। उसके बाद अक्टूबर २०१४ से जिला कलक्टर बैंक प्रशासक है।
होलसेल सहकारी उपभोक्ता भण्डार
होलसेल सहकारी उपभोक्ता भण्डार की अध्यक्ष मोना शर्मा थी। उनका कार्यकाल अक्टूबर २०१४ को पूरा होने वाला था। शर्मा ने दो माह पूर्व अगस्त २०१४ को त्यागपत्र दे दिया था। उसके बाद से संस्था के चुनाव नहीं हुए। प्रशासक के रूप में अतिरिक्त कार्यभार सीसीबी के प्रबन्ध संचालक अनिल काबरा के पास है।
सहकारी भूमि विकास बैंक (पीएलडी)
पीएलडी अध्यक्ष चेतन डीडवानिया ने अपना कार्यकाल जून २०१४ को पूरा किया था। उसके कुछ माह बाद अतिरिक्त जिला कलक्टर (प्रशासन) ने प्रशासक का कार्यभार ग्रहण किया। इन चार साल में यहां पर चुनाव के प्रयास तक नहीं किए गए।
भीलवाड़ा कृषि उपज मण्डी
कृषि उपज मण्डी अध्यक्ष पद पर अनोपीदेवी गुर्जर ने ५ अक्टूबर २०११ को कार्यभार संभाला था। गुर्जर का कार्यकाल ५ अक्टूबर २०१६ को पूरा होना था। कुछ माह पूर्व बोर्ड को भंग कर दिया गया। उसके बाद २६ सितम्बर २०१६ को प्रशासक लगा दिया था। यह संस्था किसानों से जुड़ी होने के बाद भी चुनाव कराना उचित नहीं समझा गया।
डरी हुई थी सरकार
सरकार पूरी तरह से डरी हुई थी। इन संस्थाओं में सरकार ने एक रुपए का भी बजट नहीं दिया। कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान किसानों को ७०० करोड़ का ऋण मंजूर किया गया था। उसमें भी सरकार ने कटौती कर दी। फर्जीवाड़े में ऋण माफ करने के प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए। सरकार को पूरी जानकारी थी कि को-ऑपरेटवि सोसायटी में भाजपा मात खाएगी। इस डर से चुनाव तक नहीं कराए, जबकि सहकारी विभाग सीधे तौर पर किसानों व आमजन से जुड़ा है।
रामपाल शर्मा, जिला अध्यक्ष, कांग्रेस
हार-जीत से कोई पार्टी नहीं डरती
सरकारी संस्थाओं के चुनाव क्यों नहीं हो पाए, मेरी जानकारी में नहीं है। इसके पीछे कोई न कोई कानूनी बाधा आई होगी। हार या जीत से डर की बात नहीं है। हार-जीत तो अभिन्न हिस्सा है। उससे कोई पार्टी नहीं डरती। जिसका जो समीकरण होता है, वह जीतता है। जो कल जीतता वह आज हार जाता है। चुनाव कराने की जिम्मेदारी मशीनरी की है। उसको किसने रोका। ऐसे भी अब तो आम चुनाव होने वाले हैं।
लक्ष्मीनारायण डाड, जिला अध्यक्ष, भाजपा