भीलवाड़ा

अफसरों ने नई अफीम नीति से की जमकर काली कमाई, पट्टे बहाली के बदले 30 हजार रुपए तक वसूली

राजस्थान में लागू की गई नई अफीम नीति से अधिकारियों और दलाली करने वाले मुखियाओं की मौज हो गई
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Officers earn black money with the new Opium policy
Officers earn black money with the new Opium policy

जयप्रकाश सिंह. भीलवाड़ा।

राजस्थान में लागू की गई नई अफीम नीति से अधिकारियों और दलाली करने वाले मुखियाओं की मौज हो गई। पिछले फसल वर्ष की तुलना में इस बार चार हजार से अधिक किसानों को नए पट्टे जारी किए गए। ये किसान वे है, जिनका वर्ष 1999 से लेकर 2016 तक की अवधि में किसी न किसी कारण से पट्टा निरस्त हो गया था।


केन्द्र सरकार ने चालू फसल वर्ष के लिए कई मामलों में नरमी बरतते हुए प्रावधानों में छूट दे दी, जिससे ये किसान पट्टे के लिए पात्र हो गए। कोटा में नारकोटिक्स विभाग के अतिरिक्त आयुक्त डा. सहीराम मीणा के एक लाख रुपए रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद अब पीडि़त किसान खुलकर बोलने लगे है। जानकारों के अनुसार गत फसल वर्ष में प्रदेश के चित्तौडग़ढ़, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, कोटा, झालावाड़, बारां, उदयपुर जिले में 27197 किसानों को पट्टे मिले थे। पिछले 15 सालों में डिफाल्टर रहे 4 हजार 66 किसानों के पट्टे बहाल कर देने से इस बार इनकी संख्या बढ़कर 31 हजार 263 हो गई।
एनडीपीएस के मुकदमे में अदालत से बरी हो जाने, अफीम फैक्ट्री की प्रयोगशाला में जांच में घटिया पाई गई, लेकिन उसमें मॉर्फिन की मात्रा अच्छी थी और कुछ किसानों की औसत फसल का पिछला रिकार्ड अच्छा होने के कारण पट्टा बहाल कर दिया गया।


सरकारी शुल्क 100 रुपए, वसूले 30 हजार
केन्द्र सरकार ने अफीम की खेती के पट्टे के लिए आवेदन शुल्क 100 रुपए निर्धारित कर रखा है, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने मुखियाओं के माध्यम से कई डिफाल्टर किसानों से पट्टे बहाल करने के एवज में 30 हजार रुपए तक वसूले। सालों बाद पट्टे बहाल होने के कारण इन किसानों को मजबूरी में यह राशि देनी पड़ी। उन्हें डर था कि किसी कारणवश पट्टे अटक गए तो फिर उन्हें खेती का मौका नहीं मिलेगा।


मुखिया के भरोसे छोड़ रखा किसानों को
जानकारों के अनुसार नारकोटिक्स विभाग के अधिकारियों ने किसानों को मुखिया के भरोसे छोड़ रखा है। अधिकारी किसानों को पहचानने से इनकार करते हुए मुखिया को साथ लाने या उससे मिलने की बात करते है। ऐसे में किसान को अपने हर काम के लिए मुखिया का मुंह ताकना पड़ता है। मुखिया खुद अपने अधीन किसानों का पट्टा (लाइसेंस) विभाग से लेकर आता है और किसानों को देता है। पट्टा वितरण, बुवाई, नपाई, तोल में महत्वपूर्ण भूमिका होने से अधिकांश किसान मुखिया से दबे होते है, यदि कोई मुखिया की शिकायत भी करता है तो उस तक सारी बात पहुंच जाती है।

Published on:
01 Feb 2019 04:59 pm