भीलवाड़ा

राजस्थान का खनन उद्योग संकट में: सैकड़ों खदानें बंद करने के लिए लगी कतार, क्या हैं संकट के प्रमुख कारण?

राजस्थान में क्वार्ट्ज, फेल्सपार और माइका का खनन व्यवसाय गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। स्थिति यह है कि प्रदेश के कई जिलों में 400 से अधिक खदानों को निरस्त कराने के लिए प्रस्ताव खान निदेशालय उदयपुर भेजे हैं, लेकिन लीजधारकों को राहत नहीं मिल पा रही है।
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Rajasthan Mining Industry Faces Major Crisis
क्वार्ट्ज, फेल्सपार की खदान। Photo- Patrika

भीलवाड़ा। राजस्थान में क्वार्ट्ज, फेल्सपार और माइका का खनन व्यवसाय गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। बढ़ते प्रशासनिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक हालात और तकनीकी जटिलताओं के कारण लीजधारक अपनी खदानें बंद कराने को मजबूर हैं। स्थिति यह है कि प्रदेश के कई जिलों में 400 से अधिक खदानों को निरस्त कराने के लिए प्रस्ताव खान निदेशालय उदयपुर भेजे हैं, लेकिन लीजधारकों को राहत नहीं मिल पा रही है। इसमें भीलवाड़ा की 200 खदानें शामिल हैं।

बाजार में मंदी और युद्ध का असर

अमरीका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर गुजरात के मोरवी स्थित औद्योगिक केंद्रों पर पड़ा है, जो पिछले तीन माह से बंद हैं। मोरवी में इन खनिजों की खपत न होने से बाजार में भारी मंदी छाई है।

लीजधारकों के लिए खदान का डेड रेंट और अन्य खर्च निकालना मुश्किल हो गया है। इन खनिजों को मेजर मिनरल की श्रेणी में शामिल किए जाने के बाद से इनकी देखरेख का जिम्मा भारतीय खान ब्यूरो (आईबीएम) के पास आ गया है। आईबीएम की बढ़ती सख्ती और नियमों के पेचीदा होने से लीजधारक हताश है। लीजधारकों का कहना है कि अब तो माइनिंग प्लान तैयार करने में पांच गुना खर्चा बढ़ गया है।

निर्णय लेने में अधिकारी लाचार

खदानें बंद कराने के लिए लीजधारकों की लंबी कतार लगी हैं, लेकिन फाइलों का निस्तारण नहीं हो रहा है। खान निदेशालय के पास खदान निरस्त करने के अधिकार सीमित हैं, क्योंकि खनन मंत्रालय स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। अधिकार क्षेत्र की स्पष्टता न होने और उच्च स्तर पर निर्णय लंबित होने से कोई भी अधिकारी जोखिम लेने को तैयार नहीं है। इसके चलते सबसे अधिक प्रभाव भीलवाड़ा, राजसमंद, अजमेर, ब्यावर और उदयपुर जिलों में देखने को मिल रहा है। लीजधारक न केवल आर्थिक मार झेल रहे, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण व्यवसाय समेटने को विवश हैं।

खनन संकट के प्रमुख कारण

-क्वार्ट्ज पर युद्ध का असर: प्रदेश में उत्पादित कुल क्वार्ट्ज का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अमरीका जाता है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक तनाव और युद्ध के चलते यह निर्यात ठप है।

  • फेल्सपार की आपूर्ति बाधित: फेल्सपार कच्चा माल मुख्य रूप से गुजरात के मोरवी भेजा जाता है। मोरवी के औद्योगिक क्लस्टर तीन माह से बंद होने से यहां की मांग शून्य है। फेल्सपार के ब्लॉक चीन और अमरीका भेजे जाते थे, वह भी बंद पड़े है।
  • अभ्रक: अभ्रक निर्यात पर प्रतिबंध की संभावनाओं के चलते नया निवेश नहीं हो रहा।
  • पर्यावरण स्वीकृति: एनवायर्नमेंट क्लियरेंस की प्रक्रिया बड़ी बाधा है। यदि किसी लीजधारक को अपने माइनिंग प्लान में बदलाव भी करना पड़ता है, तो ईसी प्राप्त करने में 6 से 12 महीने लग जाते है। कोई और त्रुटि या बदलाव की आवश्यकता पर प्रक्रिया में और 6 माह का समय अतिरिक्त लगता है।
Updated on:
08 Jul 2026 05:04 pm
Published on:
08 Jul 2026 05:04 pm