
भीलवाड़ा शहर के चंद्रशेखर आजाद नगर की 32 वर्षीय मंजू सुवालका ने साबित कर दिया कि अगर हौसले बुलंद हों तो विपरीत परिस्थितियां भी घुटने टेक देती हैं। कोरोना काल की उस भयानक त्रासदी ने मंजू से उनके पति विमलेश को हमेशा के लिए छीन लिया था। अचानक आए इस गहरे आघात के बाद मंजू के कंधों पर अपनी दस और पांच साल की दो मासूम बेटियों की परवरिश का भारी जिम्मा आ गया। चारों तरफ छाए अंधियारे के बीच मंजू ने टूटने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और दिन-रात कड़ी मेहनत कर राजस्थान पटवारी भर्ती परीक्षा में सफलता हासिल कर ली।
मंजू के पटवारी पद पर चयन की खबर मिलते ही उनके पैतृक गांव भोली में मानो खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा। पूरे गांव में ढोल-नगाड़ों की थाप गूंज उठी और ग्रामीणों व परिजनों ने फूल-मालाओं से अपनी इस लाडली का पलक-पावड़े बिछाकर भव्य स्वागत किया। गांव की गलियों में मंजू के सम्मान में एक गौरवमयी जुलूस निकाला गया, जहां हर आंख में मंजू के संघर्ष के प्रति सम्मान और इस कामयाबी की खुशी साफ झलक रही थी। ग्रामीणों ने कहा कि मंजू ने अपनी मेहनत और हिम्मत से न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे गांव का नाम रोशन किया है।
ग्रामीणों और अखिल राजस्थान सुवालका संघ ट्रस्ट के प्रवक्ता कैलाश सुवालका हलेड़ ने इस पल को पूरे समाज के लिए ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि मंजू का यह संघर्ष क्षेत्र की हर बेटी और महिला के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। विपरीत हालातों से लड़कर समाज का मान बढ़ाने वाली मंजू सुवालका को समाज की ओर से जल्द ही सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाएगा ताकि शिक्षा और हौसले की यह अलख दूसरी बेटियों के दिलों में भी कामयाबी की नई उम्मीद जगा सके। उन्होंने कहा कि मंजू की सफलता यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, मेहनत और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ा जाए तो हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
मंजू देवी का कहना था कि असफलता को काफी हावी नहीं होने दें। पति के निधन के बाद वह टूट गई, लेकिन विषम परिस्थितियों से बाहर निकलकर सफलता अर्जित की। उन्होंने नियमित रूप से पांच से छह घंटे पढ़ाई की। इस सफलता का श्रेय उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को दिया है।