मेवाड़ अपनी आन-बान-शान के साथ-साथ अपनी अनूठी लोक परंपराओं के लिए भी विश्व विख्यात है। जहां देशभर में होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी के साथ रंगों का उत्सव थम जाता है, वहीं वस्त्र नगरी भीलवाड़ा सहित पूरे मेवाड़ अंचल में होली का उल्लास अगले 13 दिनों तक परवान पर रहेगा। रियासतकालीन मान्यताओं और लोक […]
मेवाड़ अपनी आन-बान-शान के साथ-साथ अपनी अनूठी लोक परंपराओं के लिए भी विश्व विख्यात है। जहां देशभर में होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी के साथ रंगों का उत्सव थम जाता है, वहीं वस्त्र नगरी भीलवाड़ा सहित पूरे मेवाड़ अंचल में होली का उल्लास अगले 13 दिनों तक परवान पर रहेगा। रियासतकालीन मान्यताओं और लोक संस्कृति के संगम के चलते यहाँ अलग-अलग स्थानों पर होली खेलने के तरीके भी निराले हैं।
मेवाड़ के कई हिस्सों, विशेषकर गंगापुर और आसपास के 12 गांवों में धुलंडी के दिन रंग नहीं खेला जाता। माना जाता है कि दशकों पहले मेवाड़ राजपरिवार में हुए शोक के कारण धुलंडी पर रंग खेलना बंद किया गया था। इसके बाद यहाँ सप्तमी या शीतला अष्टमी पर होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। इनमें गंगापुर, बोराणा व कोशीथल में सप्तमी तथा पोटला, सहाड़ा व रायपुर में अष्टमी के दिन रंग खेलते है। हालांकि छोटे बच्चे जरूर रंग गुलाल खेलते है।