भक्तामर विधान : उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब
मुनि आदित्यसागर ने कहा कि ज्ञान केवल किताबी नहीं, बल्कि वह बौद्धिक चेतना है जो मनुष्य की प्रज्ञा को सभी आयामों में विकसित करे। अज्ञानी व्यक्ति न केवल भौतिक संसार में तिरस्कार का पात्र बनता है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी संसार के परिभ्रमण (जन्म-मरण के चक्र) में फंसा रहता है। शुक्रवार को आरके कॉलोनी तरणताल परिसर में आयोजित प्रवचन सभा में मुनि ने महाकवि कालिदास का उदाहरण देते हुए कहा कि जब तक वे अज्ञानी थे, जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, लेकिन ज्ञान ने उनका नाम शताब्दियों के लिए अमर कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुख और सुकून की खोज का अगला पायदान केवल ज्ञान ही है।
मुनि ने कहा कि ज्ञान के आयाम इतने विशाल हैं कि भौतिक रूप से कोई भी व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी होने का दावा नहीं कर सकता। उन्होंने महान वैज्ञानिक आइंस्टीन का रोचक किस्सा सुनाते हुए कहा कि जब उनकी पालतू बिल्ली ने बच्चा दिया, तो उन्होंने बढ़ई (खाती) को बुलाकर छोटे बच्चे के लिए अलग से छोटा छेद बनाने को कहा। जब खाती ने समझाया कि बड़े छेद से छोटा बच्चा भी निकल सकता है, तब आइंस्टीन को अपनी सहज भूल का अहसास हुआ।
आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर ट्रस्ट उपाध्यक्ष चैनसुख शाह ने बताया कि मुनि संघ के सानिध्य में शनिवार से तीन दिवसीय भक्तामर विधान आराधना का शुभारंभ होगा। दोपहर 12:15 बजे चांदबाई, नरेश, नितिन और पीयूष गोधा की ओर से किया जाएगा। विधान के प्रमुख पात्र: शांतिलाल-मंजू शाह सौधर्म इंद्र व शची इंद्राणी, ओम चंद रिखबचंद बाकलीवाल कुबेर इंद्र के रूप में रत्न वृष्टि करेंगे।
भक्तामर मंडल विधान जैन धर्म का एक शक्तिशाली अनुष्ठान है। इसमें आचार्य मानतुंग की ओर से रचित भक्तामर स्तोत्र (भगवान आदिनाथ की स्तुति) के श्लोकों का विशेष विधि-विधान से पूजन और पाठ किया जाता है, जो मन, तन और आत्मा की शुद्धि, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसमें अलग-अलग इंद्रों (देवताओं) के दायित्व निभाते हुए कई श्रद्धालु शामिल होते हैं और अर्घ्य समर्पित करते हैं।