भिवाड़ी. काली खोली में बाबा मोहनराम का लक्खी मेला भर रहा है। अखंड ज्योत के दर्शन करने के लिए दिनरात लाखों भक्त आ रहे हैं। काली खोली जाने वाले मार्ग पर 24 घंटे बाबा के भक्तों का जमघट लगा हुआ है। हाथों में निशान और जुबान पर बाबा मोहनराम का गुणगान कुछ यही नजारा दिखाई […]
भिवाड़ी. काली खोली में बाबा मोहनराम का लक्खी मेला भर रहा है। अखंड ज्योत के दर्शन करने के लिए दिनरात लाखों भक्त आ रहे हैं। काली खोली जाने वाले मार्ग पर 24 घंटे बाबा के भक्तों का जमघट लगा हुआ है। हाथों में निशान और जुबान पर बाबा मोहनराम का गुणगान कुछ यही नजारा दिखाई दे रहा है। डीजे की धुन पर नाचते गाते और बाबा मोहनराम की भक्ति में झूमते भक्त काली खोली धाम पहुंच रहे हैं। तीन दिवसीय मेले के अवसर पर उद्योग नगरी बाबा मोहनराम की भक्ति में डूबी दिखाई दे रही है। चारों तरफ भक्ति, आस्था और श्रद्धा की त्रिवेणी बह रही है। मेले में श्रद्धालुओं को दर्शन करने में असुविधा नहीं हो इसके लिए भी ट्रस्ट और प्रशासन ने व्यवस्थाएं की हैं। मंदिर निर्माण की वजह से फिलहाल अखंड ज्योत को अस्थायी रूप से नीचे रखा गया है। काली खोली स्थित सभी धर्मशाला परिसर भक्तों से भरे हुए हैं। धर्मशाला में दिनरात भजन कीर्तन की सुर लहरियां सुनाई दे रही हैं। मेला क्षेत्र से बाहर चारों तरफ हजारों भंडारे चल रहे हैं, जिसमें भक्तों को प्रसाद खिलाया जा रहा है। मेले क्षेत्र की स्थिति में कोई बाधा नहीं आए, इसकी वजह से सभी तरह के भंडारे पुलिस लाइन से बाहर ही लगाए जाते हैं। पुलिस लाइन के अंदर वाहनों को जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है। काली खोली तक जाने के लिए भक्तों को पैदल ह जाना पड़ता है।
बाबा की मान्यता
काली खोली धाम में बाबा मोहनराम का मेला 350 साल से भर रहा है। होली और रक्षाबंधन पर भरने वाले मेले में लाखों भक्त बाबा के दरबार में शीश झुकाने आते हैं। बाबा मोहनराम को भक्तजन भगवान भोलेनाथ, विष्णु और श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में पूजते हैं। बाबा का स्वरुप दिव्य ज्योत को माना जाता है। बाबा मोहनराम के दर्शन के बाद उनके घोड़े के 12 निशान बने, जो आज भी पूजे जाते हैं। इसे भीम खोज के नाम से जाना जाता है। ये निशान आज भी काली खोली धाम के पहाड़ों पर उभरे हुए हैं। खोली की पहाडिय़ों में शेषनाग की गुफा है। मान्यता है कि जब भक्तों को बाबा ने दर्शन दिए तो वे घोड़े के साथ इसी गुफा में अंदर घुसे और अदृश्य हो गए।
शिला बाजनी को बजाकर खिलाते थे प्रसाद
खोली धाम के पहाड़ों में परिक्रमा मार्ग पर एक जगह पर पत्थर बजते हैं, जिसे शिला बाजनी कहते हैं। जब भिवाड़ी में औद्योगिक क्षेत्र और ध्वनि प्रदूषण नहीं था, तब तक इस शिला से पत्थर बजाने पर उसमें से घंटे की ध्वनि आती थी। इसकी आवाज आसपास के गांव तक सुनाई देती थी। जब वहां जंगल थे, तब ग्वाले इसी शिला को बजाकर एकत्रित हो जाते थे। इसी तरह भक्त जनों द्वारा दही-मलीदा का प्रसाद खिलाने के लिए इस शिला को बजाया जाता था।
जोहड़ पर पानी पीने आती हैं गाय
काली खोली धाम के पहाड़ के ऊपर प्राकृतिक जोहड़ है, जिसमें साल भर पानी भरा रहता है। खोली क्षेत्र में गायों को चराने के बाद ग्वाले यहीं पर पानी पिलाते थे। इसके साथ ही यहां मान्यता है कि जोहड़ के पानी से स्नान करने और मिट्टी लगाने से व्यक्ति के कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए आज भी यहां पर आसपास के लोग स्नान करने आते हैं।
जगमग हो रहे देशभर के मंदिर
काली खोली धाम में विराजे बाबा मोहनराम की अखंड ज्योत अब दिल्ली, उत्तरप्रदेश और हरियाणा के कई शहरों में भक्तों को दिव्यता प्रदान कर रही है। कई शहरों में बाबा के मंदिर बन चुके हैं। सहारनपुर में बीस साल से बाबा की अखंड ज्योत प्रज्जवलित हो रही है। दिल्ली एनसीआर में बाबा की मान्यता बहुत अधिक है। अब यूपी के मेरठ, बुलंदशहर, अलीगढ़, नोएडा में भी बाबा के मंदिर बन चुके हैं।
जोहड़ की मिट्टी छांटने की है परंपरा
खोली धाम के नीचे जोहड़ है। जोहड़ को लेकर मान्यता है कि जो भक्त जोहड़ से मिट्टी छांटने के बाद दूसरी जगह डालते हैं, उनकी मनोकामना को बाबा मोहनराम पूरा करते हैं। बाबा की अखंड ज्योत से हर कोई रोशन हो रहा है। ऐसा ही एक मुस्लिम परिवार है जिसकी 12 पीढिय़ां बाबा मोहनराम का गुणगान कर रही हैं। मिलकपुर गांव में रहने वाले जाकिर बताते हैं कि शेखू उनके पूर्वज थे। अब उनकी 12 वीं पीढ़ी चल रही है। उनकी सभी पीढिय़ां बाबा का गुणगान करती रही हैं।