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Motivational Story: 54 साल की उम्र में छोड़ी नौकरी, फिर शुरू किया खुद का बिजनेस; अब करोड़ों का टर्नओवर

Ummed Singh Chaudhary Motivational Story: तीन दशक तक नौकरी करने के बाद भी मन में कुछ अपना करने की चाह रखने वाले उम्मेद सिंह चौधरी ने आखिरकार अपने सपने को साकार कर दिखाया।

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Ummed Singh Chaudhary

बेटे के साथ उम्मेद सिंह चौधरी। फोटो: पत्रिका

भिवाड़ी। तीन दशक तक नौकरी करने के बाद भी मन में कुछ अपना करने की चाह रखने वाले उम्मेद सिंह चौधरी ने आखिरकार अपने सपने को साकार कर दिखाया। 54 वर्ष की उम्र में नौकरी छोड़कर उन्होंने जो जोखिम उठाया, आज वही उन्हें एक सफल उद्योगपति के रूप में स्थापित कर चुका है। वर्तमान में उनकी दो फैक्टरियां संचालित हो रही हैं, जहां दर्जनों कर्मचारी कार्यरत हैं और हर माह लाखों रुपए वेतन के रूप में दिए जा रहे हैं।

आठ दिसंबर 1961 को जिला भिवानी के मोरका गांव में जन्मे उम्मेद सिंह चौधरी के पिता किसान थे, जबकि परिवार के अन्य सदस्य सेना में कार्यरत रहे। उन्होंने 1984 में राजकोट (गुजरात) से टूल डिजाइन में एडवांस डिप्लोमा किया और इसके बाद फरीदाबाद में 1200 रुपए मासिक वेतन पर असिस्टेंट इंजीनियर के रूप में नौकरी शुरू की। अनुभव और मेहनत के दम पर उन्होंने विभिन्न कंपनियों में कार्य करते हुए 2015 तक डीजीएम पद तक का सफर तय किया।

नौकरी छोड़कर शुरू किया खुद का सफर

2010 में खुशखेड़ा में रीको से 500 मीटर का भूखंड आवंटित कराने के बाद 2012 में उन्होंने टूल इंजीनियरिंग और ऑटोमोटिव पार्ट्स का उत्पादन शुरू किया। बड़े बेटे अजीत सिंह ने शुरुआत से ही इस काम को संभाला और 2016 में छोटे बेटे देवेंद्र सिंह भी इस व्यवसाय से जुड़ गए। नौकरी छोड़ने के बाद उम्मेद सिंह ने भी पूरी तरह फैक्टरी पर ध्यान केंद्रित किया। शुरुआत में 42 लाख रुपए का सालाना टर्नओवर आज बढ़कर करीब 10 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

40 लोगों को दे रहे रोजगार

वर्तमान में उनकी फैक्टरी में लगभग 40 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिन्हें हर महीने करीब 5 लाख रुपए वेतन दिया जाता है। 2022 में घिलोठ में दूसरी फैक्टरी के लिए भूखंड लेकर विस्तार किया गया और 2024 में जयपुर के जमवारामगढ़ में भी नए विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।

पैसे की कमी से मिली बड़ी सीख

फैक्टरी की शुरुआत के समय उन्हें भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। उत्पादन शुरू होते ही उधारी, खर्च और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो गया। बैंकों से ऋण नहीं मिलने के कारण उन्होंने रिश्तेदारों से उधार लेकर काम जारी रखा और यहां तक कि संपत्ति भी गिरवी रखनी पड़ी।

उद्योग शुरू करने के बाद मिली सबसे बड़ी सीख

उम्मेद सिंह बताते हैं कि उद्योग शुरू करने के बाद उन्हें सबसे बड़ी सीख यही मिली कि केवल पूंजी पर्याप्त नहीं होती, बल्कि निरंतर नकदी प्रवाह बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। जमीन, भवन, मशीनरी, कच्चा माल, बिजली बिल और कर्मचारियों के वेतन जैसे खर्चों के लिए अतिरिक्त संसाधनों की व्यवस्था करना हर उद्यमी के लिए बड़ी चुनौती होती है।

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