मध्यप्रदेश में स्वाइन फ्लू का कहर, इंदौर में अब तक 41 मरीजों की मौत
भोपाल. मध्यप्रदेश के स्वाइन फ्लू के कहर के कारण कई मौतें हो चुकी हैं। मध्यप्रदेश में स्वाइन फ्लू की चपेट में आने वाले मरीजों में 24 फीसदी की मौत हो चुकी है। अकेले इंदौर में अब तक 41 लोगों की मौत स्वाइन फ्लू के कारण हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक जनवरी से इंदौर में अब तक स्वाइन फ्लू के 644 सैंपल जांच के लिए भेजे गए जिनमें से 152 पॉजीटिव पाए गए, जबकि 10 की रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी प्रवीण जादिया ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि 41 मौतों में से 20 की मौत इंदौर से हुई थी। जबकि स्वाइन फ्लू के 19 मरीज अभी भी भर्ती हैं। जादिया ने कहा कि बुखार पीड़ितों के लिए क्लीनिक और स्क्रीनिंग केंद्रों की संख्या में बढ़ोतरी की है। मरीजों को वहां इलाज किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि स्वाइन फ्लू एक संक्रमण है, जो कई स्वाइन इन्फ्लूएंजा वायरस के कारण होता है, जिसमें H1N1 देशभर में सबसे आम है।
नेशनल सेंट्रल फॉर डिसीज कंट्रोल (एनसीडीसी) की रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में 24 फरवरी तक 199 लोग स्वाइन फ्लू की चपेट में आए। जिसमें से 43 मरीजों की मौत हो चुकी है। स्वाइन फ्लू के कारण मरीजों की मौत के मामले में मध्यप्रदेश देश में पहले नंबर पर है।
इस साल राजस्थान में हुई सबसे ज्यादा मौत
एनसीडीसी रिपोर्ट के अनुसार, इस साल सबसे ज्यादा 137 मरीजों की मौत राजस्थान में हुई है। इसके बाद दूसरे नंबर गुजरात में 88 मरीजों की मौत हुई है। इसके बाद मध्यप्रदेश है। लेकिन स्वाइन फ्लू के पॉजिटिव मरीजों में मौत के प्रतिशत के मामले में मध्यप्रदेश पहले स्थान पर है। बीते साल प्रदेश में 100 लोग इस बीमारी की चपेट में आए थे इनमें से 34 की मौत हो गई थी। इस साल दो महीने के भीतर ही मरीजों की संख्या 200 के पार हो गई है।
किन कारणों से हो रही है मरीजों की मौत
मध्यप्रदेश में स्वाइन फ्लू में मरीजों की मौत के कई मामले सामने आए हैं। इनमें से प्रमुख कारण है मरीजों को पहले खुद से इलाज करना और देरी से अस्पताल पहुंचना। मरीज पहले झोलाझाप डॉक्टरों से इलाज कराते हैं उसके बाद वह बड़े डॉक्टरों से संपर्क करते हैं। तब तक स्वाइन फ्लू का संक्रमण फेफड़ों तक फैल जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक 48 घंटे के भीतर इलाज शुरू हो जाना चहिए। इलाज में देरी के कारण मरीजों की मौत हो जाती है। वहीं, जानकारों का कहना है कि स्वाइन फ्लू की दवा देने में डॉक्टर देरी करते हैं। मरीज के सी कैटेगरी में पहुंचने पर ही दवा दी जाती है और जांच कराई जाती है। भोपाल में एम्स और हमीदिया के अलावा जबलपुर व ग्वालियर में जांच की सुविधा है पर सिर्फ सी कैटेगरी (गंभीर) के मरीजों के स्वाब के नमूने ही जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। कई बार जांच भी उसी दिन नहीं हो पाती है।