टंट्या भील के छठे वंशज हैं सुशील। पार्टी ज्वाइन करते ही कमलनाथ ने आदिवासी कांग्रेस का प्रदेश सचिव नियुक्त किया।
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 के मतदान में अब कुछ ही महीने बचे हैं। एक तरफ चुनाव से पहले राजनेताओं के दल बदल का दौर जोर शोर से जारी है तो वहीं, समाज सेवियों और वर्गों के बड़े चेहरों को अपने पाले में लाने की भी कवायद चल रही है। इसी कड़ी में कांग्रेस के हाथ एक बार फिर बड़ी सफलता लगी है। ये सफलता टंट्या भील के वंशज के रूप में कांग्रेस को मिली है। दरअसल, टंट्या भील के छठे वंशज कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई है।
आदिवासियों के जननायक टंट्या भील के छठे वंशज सुशील ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाते हुए टंट्या भील का चित्र भी भेंट किया। इस दौरान कई आदिवासी नेता भी मौजूद रहे। साथ ही, सुशील के साथ आदिवासी समाज के सैकड़ों लोगों ने भी कांग्रेस की सदस्यता ली है।
आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश सचिव बने सुशील
खास बात ये है कि, टंट्या मामा भील के वंशज सुशील के कांग्रेस में शामिल होते ही मध्य प्रदेश कांग्रेस की ओर से उन्हें आदिवासी कांग्रेस का प्रदेश सचिव भी नियुक्त कर दिया है। यानी अब से सुशील एक मंच के माध्यम से प्रदेश के आदिवासी समाज के हितों को उठा सकेंगे।
कौन थे टंट्या भील ?
टंट्या भील को टंट्या या टंट्या मामा के नाम से दुनियाभर में पहचाना गया है। उनका जन्म 26 जनवरी 1842 को हुआ था और निधन 4 दिसंबर 1889 को। लेकिन, 1878 से 1889 के बीच वो भारत में सक्रिय जननायक माने गए थे। द न्यूयॉर्क टाइम्स में 10 नवंबर 1889 में प्रकाशित खबर में निषादवंशी टंट्या भील को 'रॉबिनहुड ऑफ इंडिया' की पदवी से नवाजा गया था। तभी से उन्हें भारतीय 'रॉबिन हुड' के नाम से भी पहचाना जाने लगा था।
टंट्या भील आदिवासी समुदाय के सदस्य थे उनका वास्तविक नाम टंड्रा था, उनसे सरकारी अफसर या धनी लोग भयभीत थे, क्योंकि वो धनियों से माल लूटकर गरीब असहायों पर खर्च किया करते थे। यही कारण है कि, आम जनता उन्हें 'टंटिया मामा' कहा करती थी। उनका जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा जिले की पंधाना तहसील के ग्राम बड़दा में हुआ था। टंट्या को पहली बार 1874 के आसपास 'खराब आजीविका' के लिए गिरफ्तार किया गया था। एक साल की सजा के बाद उनके जुर्म को चोरी और अपहरण के गंभीर अपराधों में बदल दिया। सन 1878 में दूसरी बार उन्हें हाजी नसरुल्ला खान यूसुफजई द्वारा गिरफ्तार किया गया था। मात्र तीन दिनों बाद वे खंडवा जेल से भाग गए और एक विद्रोही के रूप में शेष जीवन जिया]। इंदौर की सेना के एक अधिकारी ने टंट्या को क्षमा करने का वादा किया, लेकिन घात लगाकर उन्हें जबलपुर ले जाया गया, जहां उनपर मुकदमा चलाया गया और 4 दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी दे दी।