- कर्मचारियों के हाथों में गन तो क्या टॉर्च और लाठियां तक नहीं दिखतीं- विदेशी आम्र्स, एम्युनिशन रखते शिकारी, लगा सकते सटीक निशाना- आइओएफ की रैपिड फायरिंग वाली पम्प एक्शन गन हैं वन विभाग के पास
दिनेश भदौरिया
भोपाल. एक ओर तो शिकारियों के पास सटीक निशाना लगाने वाली विदेशी राइफल्स हैं और दूसरी ओर वनसंपदा और वन्यजीवों की रखवाली करने वाले वन अमले के हाथ में हथियार ही नहीं रहते। उनके हथियार थाने में जमा रहते हैं। जरूरत के वक्त वे हथियारबंद तस्करों/शिकारियों से सामना ही नहीं कर सकते। रात में तो वन अमले के पास टॉर्च तक नहीं रहती हैं, जिससे अंधेरे में वे खतरे को समझ भी नहीं सकते।
भोपाल वन क्षेत्र में समरधा और बैरसिया दो टेरिटोरियल रेंज हैं, जिनमें टाइगर, लेपर्ड, हाइना, ब्लैक बक, चीतल, सांभर आदि कई दुर्लभ प्रजातियों के वन्यजीव अच्छी तादात में हैं। समरधा रेंज में मानाखेत, टाइगर गेट, बाबड़ी खेड़ा, केकडिय़ा, केरवा गेट, पिकनिक गेट, वाल्मी, बुल मदर तिराहा, अमोनी, बोरदा आदि बैरियर/नाके हैं। इसी तरह बैरसिया रेंज में भी एक दर्जन बैरियर नाके हैं। समरधा में केरवा और बैरसिया में बढली मुख्य सर्विलांस चौकियां हैं। आधिकारिक तौर पर बताया गया कि दोनों रेंज में रेंज अफसरों के पास सरकारी तौर पर इश्यू रिवॉल्वर हैं, लेकिन मैदानी अमले के पास गन नहीं हैं। यह भी बताया गया कि दोनों रेंज के पास 10-10 पंप एक्शन गन हैं, जो थानों पर जमा रहती हैं और जरूरत पर जारी की जाती हैं, लेकिन पिछले दस वर्षों से कब जारी की गईं, यह पता नहीं चल रहा।
स्टाफ डरता है हथियार लेने में
वन विभाग का अमला सरकारी हथियार इश्यू कराने से डरता है। वन विभाग के सूत्रों ने बताया कि करीब एक दशक पहले बैरसिया एसडीओ एसपी जैन और रेंज अफसर रवि खुड़े थे। उस समय तीन पंप एक्शन गन और फॉरेस्ट गार्ड राजेश धुर्वे का मोबाइल भी चोर उड़ा ले गए थे। मोबाइल को जब चोरों ने खोला तो पकड़े गए थे, लेकिन उस मामले को आज भी राजेश धुर्वे भुगत रहे हैं। राजेश को वन विभाग में बहुत अच्छे कर्मचारी माना जाता है और अच्छे काम के लिए पुरस्कृत भी किया है। अमले का हथियार अपने पास न रखने का दूसरा कारण यह है कि किस स्थिति में गोली चलाना है, यह स्पष्ट नहीं रहता। यदि किसी तस्कर/शिकारी से मोर्चा लेने में गोली चलाई तो इस तरह के प्रश्न किए जाते हैं कि बिना गोली चलाए पकडऩे का प्रयास क्यों नहीं किया गया। तीसरा कारण हथियार फील्ड में सुरक्षित रखने का इंतजाम भी वन विभाग के पास नहीं है।
शिकारियों के पास बेहतर असलहे
एक ओर वन अमला खाली हाथ रखवाली करता है, दूसरी ओर तस्करों/शिकारियों के पास बेहतर विदेशी हथियार हैं। एसटीएफ की जांच में इस बात का खुलासा हो चुका है कि शिकारी विदेशी कारतूस प्रयोग करते हैं। 30.06 कैलिबर की राइफल में इस्तेमाल होने वाले ये विशेष विदेशी कारतूस अंधेरे में शिकार पर सटीक निशाना लगाने के उपयुक्त माने जाते हैं। जानकारों का कहना है कि जैसे ही किसी जीव को निशाना बनाकर गोली दागी जाती है, तो बुलेट तेज लाइट से आगे लक्ष्य की ओर जाती है। लाइट से आकर्षित होकर जानवर उल्टा भागता है और बुलेट से हिट हो जाता है। इस तरह जानवर की जान चली जाती है। शिकारियों के पास विदेशी कारतूस निशानेबाजी के शस्त्र लाइसेंस वाले उपलब्ध कराते हैं। निशानेबाजी वाले शस्त्र लाइसेंस पर हर साल 15000 कारतूस आयात करने की अनुमति होती है। इस प्रावधान का फायदा उठाकर लाइसेंसधारी विदेश से 30.06 कैलिबर राइफल के कारतूस इम्पोर्ट कर शिकारियों को बेचते हैं। विदेश से 60 रुपए में आयात किए जाने वाले कारतूस के शिकारियों को 500 रुपए में बिकते हैं।
हमारे पास गन रखने की व्यवस्था नहीं है। जरूरत पडऩे पर थाने से मंगवाकर देते हैं। जब गन आईं थीं, तब स्टाफ को गन चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी।
- एके झवर, रेंज अफसर, समरधा
रिवॉल्वर तो रेंज अफसरों को इश्यू हैं, लेकिन गन की प्रॉपर ट्रेनिंग और रखरखाव जरूरी है। इसलिए गन थानों पर जमा हैं। टॉर्च जैसी चीज तो अमला स्वयं भी खरीद सकता है।
- हरिशंकर मिश्रा, डीएफओ, भोपाल