
भोपाल। सरकार ने समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी के बाद अभी तक मंडी शुल्क का भुगतान नहीं किया है। बोर्ड को सरकार से गेहूं-धान सहित अन्य फसलों की खरीदी के लिए 430 करोड़ रूपए मंडी शुल्क लेना है। उक्त राशि नहीं मिलने से प्रदेश की कई मंडियों में चार-पांच महीनों से वेतन नहीं बट पाया है।
मंडियां अनाज खरीदी-बिक्री पर एक रूपए 50 पैसे मंडी शुल्क वसूलती हैं। सरकार इस वर्ष धान, गेहूं, बाजरा सहित अन्य फसल समर्थन मूल्य पर खरीदा है, लेकिन अभी तक मंडी शुल्क का भुगतान नहीं किया है। मंडी शुल्क नहीं मिलने से मंडियों की अर्थ व्यवस्था गड़बड़ा गई है।
जहां मंडियों के कर्मचारियों को वेतन नहीं मिले हैं, वहीं अन्य खर्च और मंडी के रख-रखाव के लिए इधर-उधर हाथ फैलाना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा उन मंडियों की हालत खराब है जो मंडिया सी ग्रेड की हैं। इन मंडियों की संख्या 50 से अधिक है।
500 करोड़ रूपए भी नहीं किए वापस
सरकार ने चार साल पहले किसानों को बोनस देने के लिए 500 करोड़ रूपए मंडी बोर्ड से लिया था, जो अभी तक वापस नहीं किए हैं। इसके पहले भी सरकार अलग-अलग सालों में करीब 600 करोड़ रूपए ले चुकी है, जिसे भी सरकार ने वापस नहीं किया है। सरकार पर बोर्ड की लेनदारी बढ़ती जा रही है। अगर सरकार मंडी बोर्ड को यह राशि वापस कर दे तो सभी मंडियों को ए ग्रेड बनाने के साथ इन मंडियों में नए-नए तरीके से व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा सकेंगी।
एक्ट से गड़बडाई अर्थव्यवस्था
केन्द्र सरकार के नए मंडी एक्ट से प्रदेश के मंडियों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से गड़बड़ा गई है। मंडियों की आय आधी से भी कम हो गई है। जबकि मंडी टैक्स से मंडी बोर्ड को करीब 12 सौ करोड़ रूपए का टैक्स प्रति वर्ष मिलता था अभी तक बोर्ड को 600 करोड़ रूपए भी नहीं मिल पाया है। टैक्स से मिलने वाली राशि में से आधी राशि बोर्ड किसानों पर और किसान विकास कार्यों पर खर्च करता है।