MP News: सरकार इसकी समय-सीमा बताने के लिए भी तैयार नहीं है कि इन मजदूरों को उनके हक की राशि कब तक मिल जाएगी।
MP News: मध्यप्रदेश में मनरेगा (वर्तमान में परिवर्तित नाम- वीबी जीराम जी) रोज कमाकर आजीविका चलाने वाले मजदूरों की मजदूरी की राशि भी सरकार नहीं दे पाई है। हालत यह है कि प्रदेश में काम करने वाले 36 लाख से अधिक मजदूरों की 575.81 करोड़ मजदूरी का भुगतान बकाया है। यही नहीं इसी योजना में विभिन्न निर्माण कार्यों के लिए उपयोग की गई सामग्री का भी 819.04 करोड़ भुगतान बाकी है। सरकार इसकी समय-सीमा बताने के लिए भी तैयार नहीं है कि इन मजदूरों को उनके हक की राशि कब तक मिल जाएगी। इससे इनका होली का त्योहार भी फीका ही मनेगा।
विधानसभा के बजट सत्र में विधायक बाला बच्चन के प्रश्न के लिखित जवाब में श्रम एवं पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल ने यह जानकारी दी है। इसमें उन्होंने साफ कहा है कि मजदूरी एवं सामग्री की राशि भारत सरकार एवं राज्य सरकार से प्राप्त होकर व्यय किया जाना एक सतत प्रक्रिया है। इसलिए इस बकाया राशि के लिए भुगतान की समय-सीमा बताया जाना संभव नहीं है। मंत्री ने बताया 2024-25 (31.03.2025) तक वित्तीय वर्ष 2023-24 में राशि 43.74 करोड़ एवं 2024-25 में 878.11 करोड कुल 921.85 करोड़ रुपए भारत सरकार से लेना शेष थी।
केन्द्र द्वारा राशि जारी करने के लिए मध्यप्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद की तरफ से पिछले दो साल में चार बार पत्राचार किया गया। पहले उपयोगिता प्रमाणपत्र नहीं दिए जाने के कारण राशि अटकी हुई थी। लेकिन इसके बाद उपयोगिता प्रमाणपत्र भी भेज दिए गए हैं, इसके बावजूद केन्द्र ने राशि जारी नहीं की है। राज्य के पास भी इतना पैसा नहीं है कि मजदूरों की यह मजदूरी और सामग्री की राशि चुका सके। इसलिए केन्द्र से पैसा आने के बाद ही इन मजदूरों को मजदूरी की राशि मिलना संभव है। अब तक 2025-26 में सरकार ने क्रियान्वयन एजेंसी को 2024-25 एवं 2025-26 में लंबित बिलों के भुगतान के लिए राशि जारी की। बता दें मनरेगा में स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए विभिन्न निर्माण कराए जाते हैं।
सदन में चर्चा के दौरान भी विधायक सिद्धार्थ सुखलाल कुशवाहा ने कहा कि केन्द्र ने मनरेगा का नाम बदल दिया है ठीक है लेकिन केन्द्रांश और राज्यांश का यह 60 और 40 का रेशियो भी आ गया है। प्रदेश सरकार जो पहले से कर्जे में है, वह केन्द्र सरकार को 40 प्रतिशत कहां से देगी। मतलब 40 प्रतिशत नहीं देगी तो मजदूरों को रोजगार भी नहीं मिलेगा। नरेगा का मकसद था कि पलायन रुके, जो गांव में भूमिहीन लोग हैं, उनको वहीं पर रोजगार मिले। लेकिन इस बदलाव से पलायन तय है। इसलिए सरकार को इसके बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।
मनरेगा में बीते एक साल से कोई बजट नहीं जारी होने से मजदूरों के साथ ही विभिन्न निर्माणों में सामान सप्लाई करने वाले लोग भी भुगतान को लेकर विभागों के चक्कर काट रहे हैं। बजट नहीं होने के कारण करोड़ों के बिल फंसे हुए हैं। हालात ऐसे हैं कि मजदूर और सप्लायर दोनों ही परेशान हो रहे हैं। वहीं विभागीय अफसर भी इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दे पा रहे।