
Bhopal news: पानी पीने से पहले आपको थोड़ा सावधान रहने की जरूरत है। बता दें कि घरों, अस्पतालों और दवा बनाने वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाले पानी में एंटीबायोटिक दवाओं के अंश पहुंच रहे है। सामान्य सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट इन दवाओं को पूरी तरह साफ नहीं कर पाते। ऐसे में पानी से इन दवाओं के अवशेष हटाने की दिशा में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइसर) की एक रिसर्च नई उम्मीद दिखाती है। आइसर के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग में डॉ. अक्षय मोदी के रिसर्च ग्रुप ने यह पता लगाने अध्ययन किया कि कार्बन नैनोट्यूब की सतह में बदलाव से पानी से एंटीबायोटिक को ज्यादा प्रभावी तरीके से हटाया जा सकता है या नहीं।
टीम ने अलग-अलग सतह गुणों वाले चार तरह के मल्टी-वॉल्ड कार्बन नैनोट्यूब की तुलना की। नतीजे में सामने आया कि नैनोट्यूब की सतह की रासायनिक बनावट बदलने से उसकी पानी में मौजूद एंटीबायोटिक को पकडने की क्षमता काफी बदल जाती है। इनमें अमाइन-फंक्शनलाइज्ड कार्बन नैनोट्यूब ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। अनुकूल परिस्थितियों में इसने पानी से 90 प्रतिशत से ज्यादा टेट्रासाइक्लिन हटा दिया।
खास बात यह है कि इस सामग्री को वास्तविक नगर निगम के अपशिष्ट जल के साथ-साथ अस्पताल और नगर के अपशिष्ट जल जैसी परिस्थितियों में भी जांचा गया। पानी में दूसरे पदार्थ मौजूद होने के बावजूद इसका प्रदर्शन अच्छा रहा। इसे पांच बार तक दोबारा इस्तेमाल करने की क्षमता भी सामने आई।
इस रिसर्च से भविष्य में ऐसे ट्रीटमेंट सिस्टम विकसित करने में मदद मिल सकती है, जो सीवेज और अस्पतालों के पानी से एंटीबायोटिक अवशेषों को ज्यादा प्रभावी तरीके से हटा सकें। इससे पानी की सफाई बेहतर करने के साथ वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट और डिसेलिनेशन से पहले पानी की सफाई में भी मदद मिल सकती है। यानी रिसर्च का फोकस सिर्फ पानी साफ करने पर नहीं, बल्कि पानी में मौजूद उन दवाओं को हटाने पर है, जिन्हें सामान्य ट्रीटमेंट प्रक्रिया पकड़ नहीं पाती।
टेट्रासाइक्लिन एक सामान्य एंटीबायोटिक है, जिसका इस्तेमाल इंसानों और पशुओं के इलाज में किया जाता है। इसके इस्तेमाल के बाद इसके कुछ अवशेष सीवेज के जरिए पानी तक पहुंच सकते हैं। अस्पतालों और फार्मास्युटिकल उद्योगों के अपशिष्ट जल में भी ऐसे एंटीबायोटिक मिल सकते हैं।