
देश में सुअर पालन उद्योगों के लिए चुनौती बने अफ्रीकन स्वाइन फीवर (एएसएफ) से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने पहली स्वदेशी वैक्सीन बना ली। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) भोपाल के राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान के प्रयास में तैयार एमए-104 वैक्सीन शूकरों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर एएसएफ बीमारी से निपटने में कारगर साबित हुई।
गुरुवार को दिल्ली में आइसीएआर स्थापना दिवस समारोह में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराजसिंह चौहान ने वैक्सीन एमए 104 देश को समर्पित की। निहसद भोपाल के निदेशक डॉ. अनिकेत सान्याल के नेतृत्व में वैज्ञानिक डॉ. डी. सेंथिल कुमार, डॉ. के. राजूकुमार, डॉ. जी वेंकटेश और डॉ. फतेह सिंह ने इस वैक्सीन का विकास किया है।
एएसएफ पीड़ित पशु की मृत्यु तय भारत में 2020 के दौरान एएसएफ ने वायरस से पीडि़त तकरीबन सभी सुअरों की मौत हुई। वैज्ञानिकों का दावा है, जीनाटाइप-2 वायरस आधारित वैसीन प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर मृत्युदर कम करेगा।
इसी आयोजन में आइसीएआर ने 43 नई फसलों की किस्में, 17 नई कृषि तकनीकें और 14 प्रकाशन भी जारी किए। इनमें खारे और क्षारीय मिट्टी के लिए नई धान किस्में, निर्यात के लिए आम उत्पादन तकनीक, भारत की पहली स्वदेशी अफ्रीकन स्वाइन फीवर वैक्सीन, डिजिटल स्वाइन डिजीज एटलस और छोटे किसानों के लिए कम लागत वाली कसावा हार्वेस्टर मशीन शामिल हैं।
ICAR भारत में कृषि परिवर्तन का अग्रदूत है। उन्होंने कहा कि “किसान कृषि की आत्मा हैं, जबकि वैज्ञानिक उसका मस्तिष्क हैं।”
ICAR के शोध और नवाचारों की बदौलत देश ने खाद्यान्न, बागवानी, दूध और मत्स्य उत्पादन में रिकॉर्ड उपलब्धियां हासिल की हैं।