पांच साल में खो गए पुराने मुद्दे...
भोपाल। प्रदेश में पांच साल के भीतर चुनाव के मुद्दे पूरी तरह बदल गए हैं। पिछले चुनाव में व्यापमं और खनन का मुद्दा गर्र्माया था तो इस बार एट्रोसिटी एक्ट और आरक्षण बड़ा मसला है।
मंदसौर गोलीकांड के चलते खेती-किसानी के मुद्दे भी फोकस में हैं। योजनाओं में भ्रष्टाचार का मामला हर बार की तरह इस बार भी राजनीतिक दलों की सूची में है।
एट्रोसिटी एक्ट में संशोधनों के खिलाफ सामान्य वर्ग की बगावत के रूप में उठी आवाज ने पूरे चुनावों को प्रभावित किया है। अधिकारी- कर्मचारियों तक सिमटा सपाक्स संगठन चुनाव में उतर चुका है। इसकी धुरी ही जातिगत आरक्षण को खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण है। इसका ऐसा असर रहा कि बसपा ने एट्रोसिटी एक्ट के पक्ष में आवाज बुलंद करके कांग्रेस से अलग राह अपना ली है।
हालांकि भाजपा और कांग्रेस आरक्षण पर अभी लगभग खामोश हैं।
पिछले चुनाव में व्यापमं और खनन घोटाले के कारण भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया गया था।
उस समय दिल्ली में अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी के परवान चढ़ते कदम का असर मध्यप्रदेश के चुनावों में भी नजर आया था, लेकिन तब विधानसभा चुनाव के लिए 'आप' अस्तित्व में नहीं आ सकी थी। अब 'आप' मैदान में उतरी है लेकिन मुद्दा खो गया है।
2013 के बड़े मुद्दे :
व्यापमं व मेडिकल घोटाला...
अवैध खनन, नर्मदा में खनन
किसान आत्महत्या और सूखा
महंगाई व पेट्रोल-डीजल के दाम
फसल बीमा और मुआवजा राशि
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पानी
ड्रिप घोटाला, बुंदेलखंड पैकेज
2018 में अब ये मुद्दे...
एट्रोसिटी एक्ट और आरक्षण।
मंदसौर गोलीकांड, खेती की दुर्दशा ।
महिला सुरक्षा व बेरोजगारी।
महंगाई, पेट्रोल-डीजल के दाम।
इ-टेंडर व प्यजा खरीदी में घोटाला ।
शिक्षा, स्वास्थ्य व पानी की कमी ।
सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार।
5 साल के विकास के आधार पर ही भाजपा वोट मांग रही है। कांग्रेस विकास के एजेंडे पर चुनाव नहीं लड़ सकती, इसलिए नकारात्मक बातें करती है।
- दीपक विजयवर्गीय, मुख्य प्रवक्ता प्रदेश भाजपा
भाजपा सरकार के पांच नहीं पूरे पन्द्रह साल भ्रष्टाचार के हैं। अब तो भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। बच्चियों से बलात्कार की घटनाओं को सरकार रोक ही नहीं पाई है।
- दुर्गेश शर्मा, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस
इधर, ये कैसी बराबरी...28 जिलों में कोई महिला विधायक नहीं
वहीं दूसरी ओर विभिन्न राजनीतिक दल महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए मंच पर तो बातें करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला अधर में है।
मध्यप्रदेश में महिला विधायकों की बात करें तो 230 विधायकों वाली इस विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या मात्र 32 है। यह आंकड़ा 13.91 प्रतिशत है। राज्य के 28 जिले तो ऐसे हैं, जहां से कोई भी महिला विधायक नहीं है। 21 महिला विधायक उच्च शिक्षित हैं, जबकि 11 हायर सेकंडरी से नीचे हैं।
14 जिलों में दो-दो महिला विधायक
ग्वालियर, शिवपुरी, टीकमगढ़, छतरपुर, रीवा, जबलपुर, बुरहानपुर, धार और इंदौर जिले में दो-दो महिला विधायक हैं।
यहां एक-एक: गुना, सागर, दमोह, पन्ना, सतना, सिंगरौली, शहडोल, उमरिया, बालाघाट, देवास, खण्डवा, खरगौन, झाबुआ, रतलाम।