
Road Accidents :मध्य प्रदेश 'हिट एंड रन' यानी टक्कर मारकर फरार होने वाले सड़क हादसों का हॉस्टस्पॉट बन गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की हिट एंड रन मामलों को लेकर जारी रिपोर्ट ने इसका खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पांच सालों में प्रदेश में 60 हजार से अधिक हिट एंड रन के केस दर्ज हुए हैं।
2024 में तो एमपी 12,453 हादसों के साथ देश में पहले स्थान पर रहा, जबकि आबादी और वाहन संख्या में काफी आगे उत्तर प्रदेश 11,209 हादसों के साथ दूसरे और तीसरे में महाराष्ट्र 6,485 रहा। प्रदेश में बढ़ते हादसों के बीच एक और चिंताजनक पहलू पीड़ित परिवारों को मिलने वाली सरकारी मदद का है, जो कि महीनों तक फाइलों में अटका रहता है।
योजना के तहत पीडि़त परिवारों के लिए मृत्यु की स्थिति में 2 लाख और गंभीर रूप से घायल होने पर 50 हजार रुपए की सहायता का वैधानिक प्रावधान किया है। दावों के निपटारे के लिए निश्चित समय-सीमा तय की गई है। इसमें लेम इंक्वायरी ऑफिसर को एक महीने और इंश्योरेंस काउंसिल को 15 दिनों के भीतर भुगतान सुनिश्चित करना होता है।
-गुना: योजना शुरू होने से अब तक 37 प्रकरण सामने आए। केवल 15 प्रकरण स्वीकृत और 10 में भुगतान हो सका है।
-सीहोर: जिले में 134 मामले सामने आए। 54 गंभीर घायल और 80 मृत्यु के प्रकरण हैं। मृत्यु के केवल 9 और गंभीर घायल के 8 प्रकरण ही स्वीकृत हो सके हैं।
-विदिशा: मार्च 2025 से फरवरी 2026 के बीच जिले में 68 प्रकरण दर्ज हुए। इनमें 8 अस्वीकृत। 40 स्वीकृत प्रकरण में क्लेम पेंडिंग है।
-रायसेन: चार साल में 105 प्रकरण सामने आए। 12 प्रकरण ही स्वीकृत हुए, 89 पेंडिंग हैं। 88 प्रकरणों की फाइलें शुरुआती स्तर पर अटकी हुई हैं।
-दस्तावेजों की कमी: क्लेम फॉर्म में कमियां होना है। आवश्यक पुलिस एफआइआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य अनिवार्य दस्तावेज नहीं होने से फाइलें अटकीं।
-बीमा कंपनी के स्तर पर सुस्ती: विदिशा में फाइल स्वीकृत करने के बाद भी भुगतान अटका है। 55 में से 40 प्रकरण केवल जनरल इंश्योरेंस (बीमा कंपनी) में अटके हैं।
-पुलिस की लंबी जांच: जिलों में पुलिस की जांच में लंबा समय लगता है। रायसेन में 88 मामले पुलिस या एसडीएम स्तर पर अटके हैं।
-आवेदन में देरी: जानकारी के आभाव में पीडि़तों के परिजन विलंब से आवेदन करते हैं। इससे प्रारंभिक प्रक्रिया ही देर से शुरू होती है।
हादसों को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने देशव्यापी स्तर पर '4ई' का फॉर्मूला (एजुकेशन, रोड इंजीनियरिंग, पुलिस एनफोर्समेंट और इमरजेंसी केयर) लागू किया। राज्यों को हाईटेक कैमरों और स्पीड रडार के लिए 3000 करोड़ का बजट भी पहले आओ-पहले पाओ की तर्ज पर आवंटित किया। इसके बावजूद मप्र के राष्ट्रीय राजमार्गों और व्यस्त राज्य मार्गों पर गति सीमा पर नियंत्रण नहीं दिख रहा है।