MP Police Reservation: जिस गति से की जा रही भर्ती, महिलाओं को 33 फीसदी स्थान देने में ही लगेंगे 40 साल, थाने पहुंचीं पीड़िताएं किससे कहें अपना दर्द
MP Police Reservation Recruitment: किशोरियों और महिलाओं को शर्म का पर्दा घर के पुरुषों को अपराध और अत्याचार की घटना बताने से रोकता है। जैसे-तैसे वे शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचती हैं तो नजरें किसी महिला पुलिसकर्मी को ही तलाशती हैं… मानों पूछ रही हों…. किससे कहूं..कैसे कहूं? पर प्रदेश में महिला पुलिस बल की कमी से पीड़िताओं को ऐसी दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं। यह स्थिति कमोबेश पूरे प्रदेश की हैं। मध्य प्रदेश में महिला पुलिस बल की भारी कमी है, यह भागीदारी महज साढ़े सात प्रतिशत है। अधिकारी वर्ग में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व 11 फीसदी ही है। उनकी परेशानी बताती राजेंद्र गहरवार की रिपोर्ट…
पन्ना जिले के शाहनगर थाने में 2021 में बलात्कार की शिकायत लेकर गई नाबालिग को थाने में महिला पुलिसकर्मी के इंतजार में घंटों बैठना पड़ा। इसी दौरान पीडि़ता को प्रसव पीड़ा हुई और मजबूरी में उसे झाडिय़ों में ही प्रीमेच्योर मृत शिशु को जन्म देना पड़ा। इसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। फिर रेप की एफआइआर दर्ज हुई।
अगस्त 2024 में जबलपुर जिले के शहपुरा थाना में मनचले से परेशान युवती की घंटों इंतजार के बाद भी एफआइआर नहीं हो पाई। पुलिस ने सफाई दी कि महिला पुलिसकर्मी के नहीं होने से बयान नहीं हो पाए। बाद में मामला बड़े अफसरों तक पहुंचा। एसपी के दखल के बाद मनचलों पर एफआइआर दर्ज की गई।
सरकार ने पुलिस भर्ती में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है, लेकिन वर्षों से भर्ती नहीं होने के कारण पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ सकी है। इस कमी का खुलासा टाटा ट्रस्ट की इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 में भी किया है। रिपोर्ट में प्रस्तुत आंकड़े हमारे लिए चौकाने वाले हैं। मध्यप्रदेश पुलिस में महिलाओं की भागीदारी बीते पांच साल में सिर्फ एक फीसदी बढ़कर कुल पुलिस बल का साढ़े सात फीसदी तक पहुंच गई है। 2020 की तुलना में आधी आबादी के पुलिस में भर्ती में एक फीसदी का इजाफा हुआ है, पर मौके सीमित हैं। यही हाल रहे तो महिलाओं को पुलिस बल में 33 फीसदी जगह बनाने में 40 साल से अधिक समय लग जाएगा।
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के तीन साल बाद भी हालात नहीं बदले हैं। सरकार ने 2023 में पुलिस बल में आरक्षक जनरल ड्यूटी के लिए 1200 पदों की रिक्तियां निकाली। कर्मचारी चयन आयोग ने परीक्षा भी कराई, पर परिणाम की घोषणा अब तक नहीं हुई। 1200 पदों में से 396 पदों पर महिला आरक्षक भर्ती होनी है।
पुलिस बल में आरक्षक से थानेदार ही नहीं, अफसरों के पदों पर महिलाओं की स्थिति निराशाजनक है। राज्य में पुलिस सेवा अधिकारियों में उनकी संख्या 11.5 फीसदी है। कई जिलों में महिला अधिकारियों की तैनाती न्यूनतम है। पीड़िताओं को राजपत्रित अधिकारी के समक्ष बयान दर्ज कराने में लंबा समय लगता है।
बिहार पुलिस महिलाओं की भागीदारी में मील का पत्थर है। यहां पुलिसकर्मियों की संख्या कुल बल का 22त्न है। 10.6 फीसदी अधिकारी महिलाएं हैं। हालांकि दूसरे मानकों में बिहार पिछड़ा है। आंध्रप्रदेश राष्ट्रीय औसत 11 फीसदी की तुलना में दोगुने से ज्यादा आगे है।
पदों की स्वीकृति और भर्तियों में तेजी के बिना निदान संभव नहीं है। पहले महिला आरक्षण नहीं था, इसलिए अंतर ज्यादा हो गया। महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि पीड़ित तक पहुंच आसान हो। बल का युक्तियुक्तकरण समय की मांग है।
-सुभाषचंद्र त्रिपाठी, पूर्व पुलिस महानिदेशक