भारत की शानदार जीत की खबर पढ़ ही रहा था कि मोबाइल से टन्न की आवाज आई। यह सोशल मीडिया का नोटिफिकेशन था। खोला तो सामने थी कांग्रेस उम्मीदवारों की बहुप्रतीक्षित सूची। निकले 144 नाम। बस क्या था, शुरू हो गया पोस्टमार्टम।
पत्रिका कमेंट्री- विजय चौधरी
भारत की शानदार जीत की खबर पढ़ ही रहा था कि मोबाइल से टन्न की आवाज आई। यह सोशल मीडिया का नोटिफिकेशन था। खोला तो सामने थी कांग्रेस उम्मीदवारों की बहुप्रतीक्षित सूची। निकले 144 नाम। बस क्या था, शुरू हो गया पोस्टमार्टम। किस-किसको टिकट दिया, किसका कटा, किसका अटका, किसको छटका, क्यों दिया, क्या जीत पाएगा, क्या हरा पाएगा जैसे सवाल जेहन में घूमने लगे।
खिलाड़ी तैयार, रणनीति का इंतजार...।
हर नाम को देखा, परखा और सामने भाजपा के उम्मीदवार को भी रखकर समझने की कोशिश की। पाया कि दोनों ही पार्टियों ने टीम चुनने में तगड़ी मेहनत की है। जातीय और वर्गीय संतुलन बनाते हुए सियासी खिलाड़ियों के हाथों में बल्ला-बॉल थमाए गए हैं। कोई विकेट छिटकने के इरादे में है और कोई जमकर चौके-छक्के लगाने की तैयारी में। कुछ खिलाड़ी ऐसे भी उतारे गए हैं, जिन्हें अपनी ही टीम से चुनौती मिलेगी। उन्हें डर है कि अच्छी बॉल डालें मगर फील्डर कैच ही न लपके तो सामने वाले को आउट करेंगे कैसे? कुछ गुगली मास्टर भी हैं, जो टीम में जगह पाकर अब गेंद को चमका रहे हैं। ऐसे खिलाड़ियों की संख्या भी कम नहीं, जो फॉर्म में नहीं होने के बावजूद जगह पा गए।
अब बात दोनों टीमों की चयन समिति की। भोपाल से दिल्ली तक भारी जद्दोजहद के बाद नाम तय हुए हैं। सर्वे रिपोर्ट, सिफारिशीलाल, जाति का झंडा, धनबल, बाहुबल... सब पटल पर था। अपने-अपने गुण-दोषों के साथ अब तक दोनों दलों में भाजपा के 136 और कांग्रेस के 144 उम्मीदवार चुने गए। हालांकि अब भी भाजपा के 94 और कांग्रेस के 86 नाम रुके हुए हैं। दोनों दलों के आकाओं ने जल्दी नाम तय करने का वादा किया था, मगर चुनाव सिर पर आने तक भी बात अटकी हुई है। प्रतीत होता है, मानो सामने वाले की ताकत देखकर अपनी ताकत आंक रहे हों। यही वजह है, अब तक 141 सीटों पर सीधा मुकाबला तय नहीं हो सका।
जो भी हो, चुनौती अब रणनीति बनाने की है। मैच कैसे खेला जाएगा, हर खिलाड़ी को बैटिंग-बॉलिंग का हुनर कैसे सिखाया जाएगा और जोश भरने वाले वोटर कहां से जुटाए जाएंगे, इसी पर मंथन चल रहा है। प्रदेश के करीब साढ़े पांच करोड़ वोटर अभी तो दर्शक हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि 17 नवंबर तक ये वोटर तटस्थ रहेंगे। वोटर्स की जिम्मेदारी है कि वे हर खिलाड़ी का खेल देखें, समझें और इसके बाद ही वोट करें। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढे़गा, हर खिलाड़ी हरफनमौला की तरह दिखने लगेगा मगर मध्यप्रदेश का यह महामुकाबला क्रिकेट के सामान्य मैच से हटकर है। यहां खिलाड़ी नहीं, दर्शक करेंगे फैसला। यहां दर्शक वोट करेंगे और तीन दिसंबर को विधानसभारूपी स्टेडियम पर लिखा होगा विजेता टीम का नाम।
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