
आलोक पण्ड्या@भोपाल। ये बात 1992 की है। उन दिनों फिल्म की शूटिंग देखना भी एक रोमांचक अहसास हुआ करता था। गौहर महल में किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है, यह मुझे एक सीनियर पत्रकार से पता चला। नाम पता नहीं था, बस इतना पता चला कि शशि कपूर , शबाना आज़मी और ओमपुरी आए हैं।
गौहर महल की सीढिय़ों से शबाना आजमी के उतरने का एक सीन था।
छत पर शशि कपूर आराम कुर्सी पर पसरे हुए थे। पूछने पर पता चला उर्दू शायर की जिंदगी पर फिल्म बन रही है, नाम है- मुहाफिज़। यह उनके करियर की आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म को नेशनल अवार्ड भी मिला। शशि कपूर की भोपाल में संभवत: यह आखिरी ही यात्रा रही होगी। शशि कपूर उस समय तकरीबन दो महिने भोपाल में रहे, और उसी गौहर महल में ही ठहरे थे।
फिल्म की शूटिंग के दौरान उसकी कथा वस्तु का बहुत खुलासा नहीं हो सका। लेकिन बाद में जब फिल्म आई तो शशि कपूर साहब की अदाकारी ने दिल जीत लिया। शशि साहब ने इस फिल्म में भोपाल के बूढ़े शायर नूर शाहजहांनाबादी का एक ऐसा किरदार निभाया जो भोपाली फलसफे को खूबसूरती के साथ बयां करता था। उनका आराम कुर्सी पर पसरा हुआ डील-डौल, मुह में पान की गिलौरी और सफेद कुर्ता पैजामा। शशि साहब ऐसे ही नज़र आए कि जैसे जुमेराती की किसी गली में जन्मे हो।
शशि साहब को इन दिनों भोपाली बिरयानी और कबाब से से खास मोहब्बत हो गई थी। जिन लोगों ने शशि साहब को बगीचे में नाचते एक रोमांटिक हीरो की छवि में देखा होगा, मुहाफिज़ उससे बहुत अलग फिल्म थी। यह उनके एक्टिंग के कैनवास को एक अलग रंग देती है। शशि साहब जरूर छरहरे बदन के हीरो की इमैज में ही याद किए जाएंगे। लेकिन बुजुर्ग भोपाली शायर की शक्ल जब भी याद आएगी, उनका ही चेहरा याद आएगा। गौहर महल की सीढिय़ां, अब भी शशि साहब को याद करती है।
मुहाफिज फिल्म की नज्म की जानिब -
आज इक हर्फ को फिर ढूँढता फिरता है खय़ाल
मधभरा हर्फ कोई ज़हर भरा हर्फ कोई
दिलनशीं हर्फ कोई क़हर भरा हर्फ कोई
आज इक हर्फ को फिर ढूँढता फिरता है खय़ाल...