भोपाल

#WorldTheaterDay : मिलिए उन हीरोज़ से जिनके बिना पूरा नहीं होता कोई भी नाटक

गाना लिखने के लिए फोन आता था तो महाकाल मंदिर की लाइन में लगे-लगे सिचुएशन पूछकर लिख देता था गाना

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Mar 27, 2019
World Theater Day

भोपाल। रंगमंच, नाट्यकला या थियेटर समाज के सामने कला के माध्यम से अपनी बात रखने का एक जरिया है। फिर इसे सच कहे या काल्पनिक लेकिन यही रंगमंच है। कोई भी डेढ़-दो घंटे का नाटक देखने के बाद आपको जो खुशी मिलती है उसके पीछे एक पूरी टीम की मेहनत होती है। रंगमंच का मतलब सिर्फ एक्टिंग करना ही नहीं है बल्कि इससे भी कहीं अधिक है। नाटक-गीत लिखना, म्यूजिक, सेट, कॉस्ट्यूम और लाइट डिजायन करने से लेकर बहुत सारे ऐसे काम हैं जो रंगकर्म के अंतर्गत आते हैं। आज वर्ल्ड थिएटर डे के अवसर पर हम आपको बैक स्टेज के ऐसे ही कुछ हीरोज से मिलवा रहे हैं, जो एक सही मायने में एक नाटक को आकार देते हैं।

मैं इंसान था सच की राह का, आज एक अंश बन गया
जिंदगी के हर मोड़ पर, मैं रंगमंच बन गया
निभाए बहुत किरदार, हर किसी के लिए
मैं ही गुनहगार, और मैं ही पंच बन गया
आज भी देखता हूं, कलाकार बने हर इंसान को
क्या खूब जीता है वो, दुनिया के इस रंगमंच को
- सोशल मीडिया से

जो नाटक मेरे ख्यालों में रचा-बसा है उसकी लाइटिंग मुझसे बेहतर कोई और नहीं कर सकता

लाइट डिजायनिंग : विहान ड्रामा वक्र्स गु्रप के संस्थापक व युवा रंगकर्मी सौरभ अनंत बताते हैं कि मैं वर्ष 2006 से थिएटर से जुड़ा हूं। बैक स्टेज में में मेरा शुरुआत से ही इंट्रेस्ट था, चूंकि मैं पेंटिंग का स्टूडेंट था तो विजुअल और कलर हमेशा से ही अट्रैक्ट करते थे। जब मैं शैडो गु्रप के साथ था मैंने तब से ही लाइट डिजायनिंग शुरू कर दी थी लेकिन वर्ष 2011 में जब मैंने अपना पहला प्ले 'कनुप्रिया' डायरेक्ट किया तो उसके पटना में हुए सेकंड शो से मैंने लाइट डिजायनिंग शुरू की। हालांकि मेरे प्ले के फस्र्ट शो में अनूप जोशी 'बंटी' ने लाइट डिजायनिंग की थी। शहर में लाइट डिजायनिंग में अनूप जोशी और कमल जैन दो बड़े नाम हैं।

मैं अब तक स्वयं के निर्देशित प्ले के 100 से अधिक शोज में लाइट डिजायनिंग कर चुका हूं। इसके अलावा अन्य ग्रुप के नाटकों के लिए भी पुणे, जबलपुर, दिल्ली आदि शहरों में जाकर लाइट डिजायनिंग करता हूं। मुझे लगता है कि जो दृश्य चल रहा है वो फाइनली मेरी परिकल्पना है। मेरा मानना है कि जो नाटक मेरे ख्यालों में रचा-बसा है उसकी लाइटिंग मुझसे बेहतर कोई और नहीं कर सकता। उस वक्त मेरे पास पूरा अधिकार होता है कि दर्शकों को क्या दिखाना है। सामान्यत: शो शुरू होते ही डायरेक्टर का हस्तक्षेप खत्म हो जाता है। मैं मूलत: नाट्य रूपांतरण, नाट्य राइटिंग, लाइट डिजायनिंग, आर्ट डिजायनिंग, डायरेक्शन, गीत लेखन, संगीत निर्देशन और पब्लिसिटी डिजायनिंग में काम करता हूं। एक्टिंग करना मैंने वर्ष 2009 में छोड़ दिया। मुझे अपनी कहानी को कहने में ज़्यादा आनंद आता है इसलिए डायरेक्शन ज़्यादा अच्छा लगता है।

गाना लिखने के लिए फोन आता था तो महाकाल मंदिर की लाइन में लगे-लगे सिचुएशन पूछकर लिख देता था गाना

गीत लेखन व संगीत निर्देशन : नाटकों के लिए गीत लिखने और म्यूजिक कंपोज करने वाले चुनिंदा नाम हैं, उनमें एक नाम हेमंत देवलेकर भी है। विहान ड्रामा वक्र्स से ताल्लुक रखने वाले हेमंत के लिखे गीतों में ऐसी ताकत है कि नाटक देखने के बाद फिल्मों की तर्ज पर नाटक के गीत भी जुबां पर चढ़ जाते हैं। मूलत: उज्जैन से ताल्लुक रखने वाले हेमंत बताते हैं कि मैंने 1998 से कविता लिखनी शुरू की, इसके साथ-साथ रंगकर्म से भी जुड़ा। वर्ष 2007 में जब अलखनंदन जी के गु्रप नट बुंदेले में बतौर एक्टर काम करने आया तो उनके ग्रीष्मकालीन बाल नाट्य शिविर में पहली बार नाटकों में गीत लेखन का मौका मिला। इसके बाद मेरे द्वारा नाट्य रूपांतरित या मौलिक नाटकों में मेरे लिखे गीत ही होते थे।

वर्ष 2008 में संगीत नाटक अकादमी की वर्कशॉप में एक नाटक के लिए पहली बार संगीत निर्देशन किया। इसके अलावा सौरभ अनंत ने मुझे मुम्बई में होने वाले नाटक 'डाकघर' के गीत हिंदी में लिखने को कहा। सौरभ अनंत ने मुझ पर भरोसा किया कि मैं स्वतंत्र गीत-संगीत कर सकता हूं और इसके बाद गीत लेखन व संगीत निर्देशन का सिलसिला शुरू हो गया। स्वप्नप्रिया, एक कहानी बस्तर की, प्रेम पतंगा, हास्य चूड़ामणि, तोत्तो चान, रूमी, अनटाइटल्ड, चरणदास चोर, पीली पूंछ ओर आरुषि के लिए किए सभी नाटकों में गीत लेखन व संगीत निर्देशन किया। हेमंत बताते हैं कि विहान के अलावा मैंने विभा श्रीवास्तव, मुकेश शर्मा, बिशना चौहान और आनंद मिश्रा जैसे निर्देशकों के लिए भी गीत लिखे। कई बार तो मैं उज्जैन में महाकाल की लाइन में लगा होता था और फोन आता था कि एक हेमंत जी एक गीत लिखना है। मैं उनसे सिचुएशन पूछता था और लाइन में लगे-लगे गीत लिखकर उन्हें फोन पर सुना देता था।

खुशकिस्मत हूं कि 7 साल पहले वर्ल्ड थिएटर डे पर ही रंगमंच से जुड़ा था नाता

कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग : शहर में कॉस्ट्यूम डिजायनिंग का जिक्र हो तो हर निर्देशक की जुबां पर पहला नाम रश्मि आचार्य का ही आता है। 1998 में भोपाल के पहले बुटीक कला वीथिका में तीन तक साल जॉब की और फैशन डिजायनिंग के स्किल सीखे। कॉस्ट्यूम डिजाइनर होने के साथ-साथ आज रश्मि एक एक्ट्रेस और मेकअप आर्टिस्ट भी हैं। उन्हें बतौर कॉस्ट्यूम डिजाइनर फस्र्ट ब्रेक केजी त्रिवेदी के प्ले 'भूख आग है' के जरिए वर्ष 2012 में मिला जिसमें उन्होंने एक्ट भी किया था।

अब तक का सबसे बड़ा ब्रेक लोकरंग उत्सव में हुए छत्रसाल प्ले में 350 कलाकारों के कॉस्ट्यूम डिजाइन करने का रहा। जिसे रश्मि ने 15 दिन में पूरा किया था। इस साल भी लोकरंग में हुई नृत्य नाटिका रामायणी की कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग भी रश्मि ने ही की। रश्मि अब तक करीब 100 शोज में अधिक शोज में कॉस्ट्यूम डिजायनिंग कर चुकी हैं वहीं शौर्य स्मारक में मौजूद सियाचीन के सैनिकों, थल सेना के कॉस्ट्यूम भी रश्मि ने ही तैयार किया हैं। रश्मि ने बताया कि मैं मनोज नायर सर के ग्रुप में थिएटर को प्रोसेस देखने गई थी। पहली बार मंच मैं ऑन स्टेज 27 मार्च 2012 को वर्ल्ड थिएटर डे पर ही आई थी। भारत भवन में रंग आधार फेस्टिवल के तहत मनोज नायर के निर्देशन में हुए नाटक 'नेपत्थ में शकुंतला' में मेरा एक डांस मूवमेंट था, इसमें मैं भंवरा बनी थी और मैं म्यूजिक टीम में भी थी।

Published on:
27 Mar 2019 01:00 pm
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