
मिट्टी में नमी कितनी है, फसल को कब पानी चाहिए, रोग और कीट का हमला कहां हो सकता है और मंडी में भाव किस दिशा में जा रहे हैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) इन सवालों के जवाब तलाशने में किसानों की मदद कर सकती है। शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में सीमित संसाधनों के बीच उत्पादन बढ़ाने के लिए एआई आधारित मॉडल विकसित करने की जरूरत है। यह बात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के कंप्यूटर साइंस विभाग की प्रोफेसर डॉ. मंजू खारी ने बुधवार को स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय (एसकेआरएयू) में आयोजित व्याख्यान में कही।
मानव संसाधन प्रबंधन निदेशालय की ओर से आयोजित व्याख्यान में डॉ. खारी ने कृषि क्षेत्र में एआई के उपयोग और इसकी संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मिट्टी की नमी, मौसम और फसल की जरूरतों के आधार पर सिंचाई की योजना बनाने, फसलों में रोगों और कीटों की समय रहते पहचान करने तथा संभावित उत्पादन का अनुमान लगाने में यह तकनीक उपयोगी हो सकती है। इसके साथ ही मंडी भाव और बाजार के रुझानों का विश्लेषण कर किसानों को निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
शुष्क क्षेत्रों की चुनौतियों पर फोकस
डॉ. खारी ने कहा कि शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों की कृषि संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखकर एआई आधारित मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं बन सकती हैं। उन्होंने तकनीक का लाभ अंतिम किसान तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। कार्यक्रम में अनुसंधान निदेशक डॉ. एन.के. शर्मा, प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. दीपाली धवन, कृषि संकाय अधिष्ठाता डॉ. विजय प्रकाश, सामुदायिक विज्ञान संकाय अधिष्ठाता डॉ. वीर सिंह, स्नातकोत्तर अध्ययन के अधिष्ठाता डॉ. आर.के. वर्मा और मानव संसाधन प्रबंधन निदेशालय (डीएचआरडी) के निदेशक डॉ. एच.एल. देशवाल सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न अधिष्ठाता, निदेशक, अधिकारी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।