
राजस्थान के बीकानेर संभाग के सबसे बड़े पीबीएम अस्पताल की कथित बदहाली और लचर व्यवस्थाओं को लेकर सड़कों पर उतरे एनएसयूआई के छात्र कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच जबरदस्त खींचतान हुई है। यह पूरा आंदोलन अस्पताल प्रशासन और राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के खिलाफ केंद्रित था। प्रदर्शन के दौरान छात्र इतने उग्र हो गए कि वे अपने साथ जूतों की माला लेकर पीबीएम अधीक्षक के कार्यालय की तरफ बढ़ गए, जिसके बाद मौके पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल को मोर्चा संभालना पड़ा।
बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में दवाओं की कमी, जांच मशीनों की खराबी और दूर-दराज के गांवों से आने वाले मरीजों को मिलने वाले कथित खराब इलाज के विरोध में कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई संगठन ने एक बड़ी विरोध रैली का आयोजन किया था। छात्र कार्यकर्ताओं ने रैली के दौरान राजस्थान के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और चिकित्सा विभाग पर बीकानेर की अनदेखी करने का सीधा आरोप लगाया।
प्रदर्शन का सबसे विवादित मोड़ तब आया जब छात्र नेता अपने हाथों में जूतों की माला लेकर पीबीएम अधीक्षक को पहनाने की आक्रामक जिद पर अड़ गए।
जैसे ही रैली अस्पताल परिसर के नजदीक पहुंची, वहां पहले से तैनात पुलिस अधिकारियों ने छात्रों को बीच रास्ते में ही रोक लिया। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर धक्का-मुक्की और झड़प शुरू हो गई।
अस्पताल परिसर के भीतर मरीजों और उनके तीमारदारों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस प्रशासन ने प्रदर्शनकारी छात्रों को अधीक्षक कार्यालय के मुख्य गेट से काफी दूर रोकने का प्रयास किया।
जब एनएसयूआई के कार्यकर्ता और छात्र नेता पुलिस के घेरे को तोड़कर जबरन अंदर घुसने का प्रयास करने लगे और जूतों की माला लहराते हुए आगे बढ़े, तो पुलिस ने हालात को पूरी तरह अनियंत्रित होने से बचाने के लिए हल्का बल प्रयोग किया।
बीकानेर का पीबीएम अस्पताल केवल शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के कई जिलों के लाखों मरीजों की लाइफलाइन माना जाता है। कांग्रेस पार्टी और उसके अग्रिम संगठन एनएसयूआई द्वारा अस्पताल की बदहाली को लेकर पिछले काफी समय से चरणबद्ध तरीके से आंदोलन चलाया जा रहा है।
एनएसयूआई का आरोप है कि अस्पताल के कई वार्डों में बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह ठप हैं और गरीब मरीजों को निजी लैब्स में महंगी जांचें करवानी पड़ रही हैं।
छात्रों की मांग है कि पीबीएम अस्पताल के प्रशासनिक पदों पर बैठे लापरवाह अधिकारियों को तुरंत हटाया जाए और चिकित्सा मंत्री स्वयं यहां के विधिक हालातों का औचक निरीक्षण करें। दूसरी ओर, अस्पताल प्रशासन का कहना है कि वे सीमित संसाधनों में बेस्ट मेडिकल सुविधाएं दे रहे हैं और छात्रों का यह तरीका पूरी तरह से गैर-कानूनी और अमर्यादित था।