बीकानेर

Raksha Bandhan : स्नेह बंधन जो खून से नहीं, दिल से बनते हैं और जीवन भर निभाए जाते हैं

मुस्कान बाई बताती हैं कि हमारे समाज में बहन, बेटी, ननद और भतीजी जैसे रिश्ते बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। एक बार रिश्ता बना, तो उसका निर्वहन पूरी आत्मीयता से जीवनभर किया जाता है।

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Aug 09, 2025
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रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन के खून के रिश्ते का त्योहार नहीं, बल्कि आत्मीयता से बने उन बंधनों का भी उत्सव है, जो जीवनभर निभाए जाते हैं। किन्नर समाज में यह त्योहार न सिर्फ धागा बांधने की रस्म है, बल्कि अपनापन, आशीर्वाद और साथ निभाने का वचन भी है। यहां रिश्ते दिल से बनाए जाते हैं और जीवनभर पूरी निष्ठा से निभाए जाते हैं। किन्नर समाज की प्रमुख मुस्कान बाई बताती हैं कि हमारे समाज में बहन, बेटी, ननद और भतीजी जैसे रिश्ते बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। एक बार रिश्ता बना, तो उसका निर्वहन पूरी आत्मीयता से जीवनभर किया जाता है। हर पर्व और त्योहार को इन्हीं रिश्तों की डोर में बांधकर मनाया जाता है।

भात भरने से राखी तक, भावनाओं का सफर

बीकानेर के बड़ा बाजार स्थित किन्नर हवेली में इस बार रक्षाबंधन का दृश्य भावनाओं से भरा था। मुस्कान बाई ने किशनगढ़ सम्मेलन में संगीता बाई को अपने गुरु रजनी बाई की बेटी बनाया था। इस रिश्ते के अनुसार, संगीता अब मुस्कान की ननद है। रक्षाबंधन पर संगीता बाई खासतौर से बीकानेर पहुंचीं। भाभी के हाथ पर राखी बांधी। तिलक किया। मिठाई खिलाई और उनकी लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना की। उन्होंने भतीजियों को भी राखियां बांधीं।

प्यार और आशीर्वाद के रंग

राखी से पहले संगीता ने भाभी की बला और नजर उतारी। लोटे के पानी का एक घूंट पिया और फिर उपहार स्वरूप साड़ियां, वस्त्र और मिठाइयां दीं। बदले में मुस्कान बाई ने भी अपनी ननद को कपड़े दिए और चूड़ियां व अन्य सामान दिलवाने बाजार ले गईं। माहौल में हंसी, अपनापन और आशीर्वाद के स्वर गूंजते रहे।

मेरा पीहर हरा-भरा रहे

संगीता बाई ने भावुक होकर कहा, मेरे पीहर में सदा खुशियां रहें। भाभी मुस्कान निरोग रहें और फले-फूलें। मेरे पीहर के यजमान प्रसन्न रहें और उनकी हर इच्छा पूरी हो।

रिश्तों की विरासत

मुस्कान बाई ने अब तक दो बेटियां और सात बहनें बनाई हैं। हर त्योहार उनके साथ रीति-रिवाज से मनाती हैं। वह बताती हैं कि उनके गुरू मधु भुआ ने भी पदमपुर की लाली भुआ को अपनी बेटी बनाया था। यह परंपरा सिर्फ रक्षाबंधन तक सीमित नहीं, बल्कि सालभर हर पर्व पर रिश्तों में अपनापन भरने का जरिया है।

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