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फेकल्टी के पलायन से मेडिकल कॉलेज जूझ रहे असिस्टेंट प्रोफेसर की कमी से

प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर की लगातार भर्ती हो रही है। फिर भी मेडिकल कॉलेज फेक​ल्टी की कमी से जूझ रहे है। इसकी वजह है जरनल मेडिसिन व सर्जरी सहित अन्य विभागों में पद रिक्त पदों का कारण वन टाइम ऑप्शन बना हुआ है।

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बीकानेर. चिकित्सा शिक्षकों की कमी से जूझ रहे चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग में उनके ही बनाए नियम आड़े आ रहे हैं। वन टाइम ऑप्शन के प्रावधान से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पदों पर चयनित होकर एमसीएच और डीएम किए अभ्यर्थी सुपर स्पेशलिटी विभाग में चले जाते है। इससे एक बार तो असिस्टेंट प्रोफ़ेसरों के पद भर जाते है, लेकिन कुछ समय बाद वे खाली हो जाते है। जिससे मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा शिक्षकों की कमी रहती है। इससे एक तरफ एमबीबीएस कर रहे विद्यार्थियों को फेकल्टी के अभाव में गुणवत्ता युक्त शिक्षण नहीं मिल पाता। दूसरी तरफ मेडिकल कॉलेजों का राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा निरीक्षण किए जाने पर मान्यता बचाने के लिए अस्थाई रूप से इधर उधर से फेकल्टी पद भरने पड़ते है।

राजस्थान लोक सेवा आयोग की ओर से हाल ही में मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जनरल सर्जरी व अन्य विभागों के पदों पर भर्ती की गई। इसमें ऐसे अभ्यर्थीयों का भी चयन किया गया है, जो एमसीएच (शल्य चिकित्सा के मास्टर) व डीएम (चिकित्सा में डॉक्टरेट) किए हुए है। इससे असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पदों के लिए निर्धारित न्यूनतम योग्यता एमएस (मास्टर ऑफ़ सर्जरी) तथा एमडी ( मास्टर ऑफ़ मेडिसिन) वाले अभ्यर्थियों के अवसर कम हो गए। साथ ही एमसीएच और डीएम किए अभ्यर्थी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के लिए चयनित होकर अपने सुपर स्पेशलिटी विभाग में चले जाते है। जिससे मूल पद फिर रिक्त हो जाता है। जो अस्पतालों में सर्जरी और मेडिसिन विभागों में फेकल्टी की कमी का कारण बनता है।

वन टाइम ऑप्शन से मिला रास्ता

एमसीएच व डीएम योग्यताधारी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने के बाद वन टाइम ऑप्शन को चुनते है। जिससे वे सुपर स्पेसिलिटी विभाग में चले जाते है। ऐसे में असिस्टेंट प्रोफेसर वाला पद रिक्त हो जाता है। दूसरी तरफ सुपर स्पेशलिटी विभाग में सीधी भर्ती के पद कम हो जाते है। जिसका नुकसान न्यूनतम योग्यताधारी अभ्यर्थियों को होता है।

पांच साल का अनुबंध हो

जानकारों का कहना है कि एमसीएच या डीएम एक सुपर स्पेशलिटी डिग्री है। लोक सेवा आयोग के माध्यम से अलग से भर्ती की जाती है। ऐसे अभ्यर्थी अपने विषय की भर्ती परीक्षा के लिए ही पात्र माने जाए, इन्हें वन टाइम ऑप्शन नहीं मिले। अथवा असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जनरल सर्जरी / मेडिसिन विभाग में चयन होने पर 5 साल इसी पद पर रहने का अनुबंध पत्र लिया जाए।

चिकित्सकों ने उठाई आवाज

इस व्यवस्था से व्यथित कुछ चिकित्सकों ने प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग को ज्ञापन भेजकर एमसीएच /एमडी अभ्यर्थियों के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के लिए चयन होने पर कम से कम 5 साल कार्य बॉन्ड भरवाने की मांग की है।

पांच साल में 31 का पलायन

पिछले 5 सालों में एमसीएच या एमडी वाले 31 अभ्यर्थी अपना मूल चयनित पद छोड़कर सुपर स्पेशलिटी विभागों में जा चुके है। आरटीआइ से प्राप्त सूचना के अनुसार 5 साल में प्रदेश के सभी 6 मेडिकल कॉलेजों में 31 अभ्यर्थियों का चयन असिस्टेंट प्रोफ़ेसर मेडिसिन अथवा जनरल सर्जरी में हुआ। वे वन टाइम ऑप्शन का लाभ लेकर अपने मूल पद को छोड़कर अपनी एमसीएच/डीएम की सुपर स्पेशलिटी ब्रांच में चले गए। इनमें सबसे ज्यादा एसएमएस मेडिकल कॉलेज में 17 अभ्यर्थी जनरल से सुपर स्पेशलिटी में चले गए। जबकि जेएलएन मेडिकल कॉलेज अजमेर में 5, एसपी मेडिकल कॉलेज बीकानेर में 4, मेडिकल कॉलेज जोधपुर में 3, मेडिकल कॉलेज कोटा में 1, मेडिकल कॉलेज उदयपुर में 1 ने मूल चयन पद छोड़ दिया।

व्यवस्था की समीक्षा हो

सुपर स्पेशलिटी विभागों के लिए अलग से भर्ती परीक्षाएं होती है तो ऐसे अभ्यर्थियों के लिए अपनी भर्ती में ही आवेदन करने का प्रावधान होना चाहिए। जिससे मूल फेकल्टी के पदों पर असर नहीं पड़े। सरकार को मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। सभी पद भरे होंगे तो मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिलेगी। -डॉ. सांवर मल कांटवा, एमबीबीएस,एमएस, जयपुर