
बीकानेर. महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की ओर से 'राजस्थानी कहानी : परंपरा की दृष्टि और आधुनिकता की पहचानÓ विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी में दूसरे दिन मंगलवार को राजस्थानी कहानी के शिल्प, प्रयोग-प्रभाव पर चर्चा की गई।डॉ. नमामि शंकर आचार्य के संयोजन में हुई गोष्ठी में डॉ. नीरज दइया व कृष्ण कुमार आशु ने इक्कीसवीं सदी की राजस्थानी कहानियों पर प्रकाश डाला। ओमप्रकाश भाटिया ने कहा कि सूचना की उम्र कम होती है, जबकि साहित्य की उम्र लंबी होती है।
चौथे सत्र में डॉ. गौरीशंकर प्रजापत के संयोजन व मारवाड़ रत्न देवकिशन राजपुरोहित की अध्यक्षता में कमल रंगा ने राजस्थानी कहानी में युगबोध की बात कही। बुलाकी शर्मा ने कहानी विधा की संभावनाओं और रामकुमार घोटड़ ने लघुकथा परंपरा पर पत्रों के माध्यम से विचार साझा किए। देवकिशन राजपुरोहित की री टाळवी कहानियों पर डॉ. नीरज दइया की ओर से संपादित पुस्तक का भी लोकार्पण हुआ।
भाषा में परंपरा का बड़ा योगदान
राजस्थानी विभाग की प्रभारी डॉ. मेघना शर्मा ने समापन सत्र में कहा कि उत्तरआधुनिकता को प्रतिबिंबित करता स्त्री विमर्श आधारित साहित्य आज वक्त की जरूरत बन गया है। मुख्य अतिथि मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि भाषा में परंपरा का बड़ा योगदान है, कहानी मनुष्य जीवन की प्रतिलिपि है। अजमेर के साहित्यकार लक्ष्मीकांत व्यास ने कहा कि बदलते परिवेश में कहानी विधा में भी बदलाव होना चाहिए। वही कहानी लिखी जानी चाहिए, जो समाज चाहता है। समापन समारोह में डॉ. नमामि शंकर आचार्य की ओर से मूल लेखक डॉ. राजशेखर पुरोहित की अनूदित पुस्तक भारत रो अकीकरण का अतिथियों ने लोकार्पण किया।