
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में सोमवार से सहजन (मोरिंगा) आधारित कृषि प्रणाली विषय पर तीन दिवसीय किसान कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ। नाबार्ड वित्तपोषित परियोजना के तहत आयोजित इस प्रशिक्षण में जिले की विभिन्न तहसीलों के 35 किसान भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रमोद मिश्रा ने कहा कि आयुर्वेद में सहजन को 'अमृत वृक्ष' माना गया है। उन्होंने बताया कि आधुनिक शोधों के अनुसार सहजन में अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं।
काजरी के अध्यक्ष डॉ. नवरत्न पंवार ने कहा कि पश्चिमी राजस्थान की जलवायु में सहजन आधारित खेती किसानों के लिए आय का बेहतर विकल्प बन सकती है। उन्होंने बताया कि सहजन का उपयोग मानव भोजन के साथ-साथ पशु चारे के रूप में भी किया जा सकता है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन में भी सुधार की संभावना रहती है। उन्होंने कहा कि सहजन के मूल्य संवर्धन के माध्यम से किसानों को प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार कर अतिरिक्त आय और रोजगार के नए अवसर भी मिल सकते हैं।
अब तक 21 प्रशिक्षण, 250 किसान जुड़े
परियोजना के मुख्य समन्वयक डॉ. बीरबल ने बताया कि इस परियोजना के तहत अब तक 21 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इनमें बीकानेर जिले के विभिन्न क्षेत्रों के किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान प्रत्येक किसान को लगभग एक हजार सहजन के पौधे नि:शुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अब तक करीब 250 किसान इस परियोजना से जुड़कर सहजन की खेती शुरू कर चुके हैं। कई किसान सहजन पाउडर सहित अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रहे हैं।