Bilaspur High court: कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल चूड़ी पहनाने की रस्म या लंबे समय तक साथ रहने से विवाह वैध नहीं माना जा सकता, जब तक कि पहला विवाह विधिवत रूप से तलाक या मृत्यु के माध्यम से समाप्त न हुआ हो..
Bilaspur High court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा है कि पहली शादी से पत्नी के रहते केवल चूड़ी प्रथा के आधार पर की गई दूसरी शादी को कानूनन मान्यता नहीं दी जा सकती। ऐसी स्थिति में दूसरी महिला या उसकी संतान को संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगा।
जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की एकल पीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का हवाला देते हुए कहा कि जीवित पति या पत्नी के रहते किया गया दूसरा विवाह कानून की नजर में शून्य होता है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल चूड़ी पहनाने की रस्म या लंबे समय तक साथ रहने से विवाह वैध नहीं माना जा सकता, जब तक कि पहला विवाह विधिवत रूप से तलाक या मृत्यु के माध्यम से समाप्त न हुआ हो।
यह मामला दुर्ग निवासी सगनूराम की संपत्ति से जुड़ा था। पहली पत्नी की बेटी सूरज बाई और दूसरी कथित पत्नी ग्वालिन बाई की बेटियों के बीच मालिकाना हक को लेकर विवाद सामने आया था। सुनवाई के दौरान यह तथ्य उजागर हुआ कि ग्वालिन बाई के साथ चूड़ी विवाह के समय उनका पहला पति जीवित था और किसी भी प्रकार के कानूनी या प्रथागत तलाक का कोई प्रमाण मौजूद नहीं था। गवाहों की जिरह में भी इस बात की पुष्टि हुई।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि पटवारी या राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज होना किसी व्यक्ति को कानूनी वारिस नहीं बनाता। उत्तराधिकार का निर्धारण केवल कानून के आधार पर ही किया जा सकता है। इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के वर्ष 2002 के फैसले को बरकरार रखते हुए निर्णय दिया कि सगनूराम की संपत्ति पर अधिकार केवल पहली पत्नी की संतान का ही होगा।