
Nag Panchami Dangal: नागपंचमी पर कभी बिलासपुर के अखाड़ों में सुबह से ही पहलवानों की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। मिट्टी के अखाड़े में दांव-पेंच आजमाते पहलवान, उन्हें देखने जुटती भीड़ और तालियों की गूंज नागपंचमी की पहचान हुआ करती थी। लेकिन अब यह तस्वीर इतिहास बनती जा रही है। नागपंचमी पर लालबहादुर स्कूल मैदान में होती आ रही दंगल प्रतियोगिता इस बार भी नहीं होगी। पहलवानों की कमी के कारण करीब 100 साल पुरानी कुश्ती की परंपरा लगातार दूसरे साल टूट रही है।
बिलासपुर में कभी कुश्ती को बढ़ावा देने वाले कई अखाड़े हुआ करते थे। जय मां अंबे अखाड़ा, कतियापारा और बजरंग अखाड़ा, गोंडपारा जैसे अखाड़ों में नियमित रूप से पहलवान अभ्यास करते थे।सुबह और शाम मिट्टी के अखाड़ों में पहलवानों की कसरत होती थी। नागपंचमी आते ही इन्हीं अखाड़ों के पहलवान दंगल में उतरते और अपने हुनर का प्रदर्शन करते थे।समय के साथ अखाड़े बंद होते गए और नई पीढ़ी का रुझान भी कुश्ती से कम होता गया। नतीजा यह है कि अब बड़े स्तर पर दंगल कराने के लिए स्थानीय पहलवान ही आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते।
आदर्श युवा मंच के आयोजक महेश दुबे ने बताया कि बड़े स्तर पर कुश्ती प्रतियोगिता कराने के लिए पहलवानों को कम से कम एक महीने पहले सूचना देनी पड़ती है। वर्तमान में पहलवानों के संपर्क और उपलब्धता पहले जैसी नहीं रह गई है। समय पर पहलवान नहीं मिलने के कारण इस बार भी दंगल का आयोजन संभव नहीं हो सका।
कभी नागपंचमी पर शहर के अखाड़ों में कुश्ती देखने हजारों लोग पहुंचते थे। पहलवानों के दांव-पेंच और जोर आजमाइश आकर्षण का केंद्र होते थे। अब अखाड़ों के बंद होने के साथ यह परंपरा भी खत्म हो गया है।
महेश दुबे ने बताया कि लालबहादुर स्कूल मैदान में होने वाली दंगल प्रतियोगिता की परंपरा करीब 100 साल पुरानी है। अलग-अलग कारणों से यह परंपरा अब तक पांच बार टूट चुकी है। वर्ष 1996 में भी पहलवानों की कमी के कारण दंगल नहीं हो सका था। इसके बाद कोरोना काल में भी एक साल प्रतियोगिता आयोजित नहीं हुई।