
Land Compensation: रतनपुर निवासी उमेश कुमार गुप्ता पिछले करीब दस वर्षों से अपनी अधिग्रहित जमीन के मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। एनएच-45 के सड़क चौड़ीकरण के दौरान उनकी पैतृक कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया था, लेकिन आरोप है कि लंबे समय बाद भी उन्हें पूरी मुआवजा राशि नहीं मिल पाई है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे उमेश ने अब जनदर्शन में आवेदन देकर प्रशासन से न्याय और मुआवजा दिलाने की मांग की है।
उमेश कुमार के मुताबिक, रतनपुर-पेंड्रा मार्ग के चौड़ीकरण के दौरान उनकी जमीन अधिग्रहित की गई थी। खसरा नंबर 883/6, 883/19, 883/20 और 891/5 की जमीन उनके बेटों दीपक कुमार समेत परिवार के अन्य सदस्यों के नाम दर्ज थी। अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान खसरा नंबर 883/6, 883/20 और 891/5 का राजपत्र में प्रकाशन हुआ, लेकिन 883/19 का प्रकाशन नहीं हो सका। पीड़ित का कहना है कि राजपत्र में प्रकाशन नहीं होने के बावजूद संबंधित जमीन का इस्तेमाल सड़क निर्माण में कर लिया गया। इसके बाद मुआवजे को लेकर उन्होंने अधिकारियों के समक्ष कई बार आवेदन और अपील की।
उमेश कुमार का आरोप है कि खसरा नंबर 883/20 के लिए उन्हें जो मुआवजा मिला, उसमें करीब दो लाख रुपये कम दिए गए। वहीं, खसरा नंबर 883/19 की जमीन का मुआवजा अब तक नहीं मिला है। उनका कहना है कि इस मामले को लेकर वह लगातार अधिकारियों से संपर्क करते रहे, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। इसी दौरान दिल्ली से आई टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में उनकी जमीन के एनएच-45 सड़क निर्माण में अधिग्रहित होने की बात स्पष्ट की थी। इसके बावजूद मुआवजा राशि जारी नहीं होने से परिवार की परेशानी बढ़ती गई।
उमेश कुमार गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और उन्हें नियमित रूप से इलाज के लिए अस्पताल जाना पड़ता है। परिवार के मुताबिक, लंबे समय से मुआवजा नहीं मिलने के कारण आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है। इलाज और अन्य जरूरी खर्चों को पूरा करना भी मुश्किल हो रहा है। करीब एक दशक से सरकारी दफ्तरों में लंबित प्रकरण के कारण अब पीड़ित ने जनदर्शन में अपनी शिकायत रखी है। उनका कहना है कि उन्हें अपनी ही जमीन के मुआवजे के लिए वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है।
मुआवजा प्रकरण में रतनपुर क्षेत्र के तत्कालीन पटवारी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उमेश कुमार ने आरोप लगाया है कि जब दिल्ली से आई टीम ने जमीन के सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने की पुष्टि कर दी थी, तब वह मुआवजे से जुड़े दस्तावेजों के लिए पटवारी के पास पहुंचे थे। पीड़ित का आरोप है कि तत्कालीन पटवारी ने कथित तौर पर मुआवजा दिलाने के एवज में 10 डिसमिल जमीन की मांग की थी।
उमेश के मुताबिक, उन्होंने इस संबंध में भ्रष्टाचार की शिकायत भी की, लेकिन मामले में अपेक्षित स्तर पर जांच नहीं होने से उन्हें अब तक राहत नहीं मिल सकी। हालांकि, पटवारी पर लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
मामले की शिकायत सामने आने के बाद प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया है। बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल के अनुसार प्रकरण से जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण किया जा रहा है। बैठक के दौरान कोटा एसडीएम को मामले की जांच के निर्देश दिए गए हैं। कलेक्टर ने कहा कि मामले की जांच के बाद पीड़ित को नियमानुसार जल्द से जल्द मुआवजा दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
एनएच-45 सड़क निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद मुआवजे को लेकर करीब दस वर्षों से चल रहा यह मामला अब एक बार फिर प्रशासन के सामने पहुंचा है। एक तरफ पीड़ित अधिग्रहित जमीन का लंबित मुआवजा और कथित कम भुगतान की राशि पाने की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन पटवारी पर लगाए गए आरोपों की भी जांच जरूरी है।
अब प्रशासनिक जांच में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि खसरा नंबर 883/19 के मुआवजे में देरी क्यों हुई, खसरा नंबर 883/20 के भुगतान में कथित दो लाख रुपये की कमी का आधार क्या था और तत्कालीन पटवारी पर लगाए गए 10 डिसमिल जमीन मांगने के आरोपों में कितनी सच्चाई है। जांच के परिणाम के बाद ही इस लंबे समय से लंबित प्रकरण की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।