पहले और अब: 3 करोड़ 26 लाख में हुआ था बनकर तैयार, 3.50 करोड़ में हुई मरम्मत
शैलेन्द्र पाण्डेय/बिलासपुर. नई तकनीक आ गई, संसाधन कई गुना बढ़ गए लेकिन सरकारी निर्माण के हालात नहीं बदले। एक तरफ अरपा का पुराना पुल 92 साल बाद भी जवान की तरह खड़ा है। इससे रोजाना हजारों लोगों का आवागमन हो रहा है। जबकि लोक निर्माण विभाग द्वारा बनवाया गया तुर्काडीह पुल 7 साल में ही दरकने लगा। पुल को बंद कराकर मरम्मत करवानी पड़ी, जिसमें 3 करोड़ 50 लाख रुपए खर्च हो गए, जबकि इस पुल के निर्माण की कुल लागत ही 3 करोड़ 26 लाख रुपए आई थी।
पुराना अरपा पुल
देवकीनंदन चौक से सरकंडा जबड़ापारा को जोडऩे वाले इस पुल का निर्माण ब्रिटिश शासन काल में हुआ था। यह अरपा नदी पर पहला पुल था। उस समय इसकी लागत लगभग 1 लाख रुपए आई थी। शहर के ही एक ठेकेदार रहीम उल्ला खान नने सन् 1924 में इस पुल का निर्माण कार्य शुरू किया, यह पुल 1926 में बनकर तैयार हुआ। 92 साल पूर्व 30 जुलाई 1926 में इस पुल को लोकार्पित किया गया। पुल निर्माण के कुछ अरसे बाद ठेकेदार रहीम उल्ला अपने पैतृक निवास पाकिस्तान चले गए। इस पुल पर आवागमन आज भी जारी है। इस पुल ने लाखों लोगों को नदी पार कराया, हजारों भारी वाहनों का भ्भी बोझ उठाया, लेकिन कभी उफ तक नहीं कहा। हाल में 10-11 साल पहले एहतियात के तौर पर इस पुल से भारी वाहनों का गुजरना बंद कराया गया। दरसइल इस पुल पर सरस्वती शिशु मंदिर के सामने का कुछ हिस्सा अचानक धंसने लगा। पिलर पर दरारें नजर आईं, जिसके बाद इसकी मरम्मत करवाकर सिर्फ मध्यम व छोटे वाहनों के लिए इसे खोला गया।
चूना गोंद से बना पुल
उस जमाने में अरपा नदी से उस पार के गांवों में आवागमन के लिए सिर्फ नाव ही एक माध्यम था। कतियापारा डोंगाघाट और नेहरू चौक चितले कालोनी से महामाया चौक के बीच नाव चला करती थी। नेहरू चौक के पास कलेक्ट्रेट व तहसील कार्यालय के अलावा और कोई निर्माण नहीं था। पुल बनने के बाद सन् 1935 से अरपापार सरकंडा का विकास शुरू हुआ। लेकिन इस पुल के निर्माण के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी। कई जगह सर्वे कराने के बाद ब्रिटिश अफसरों ने नदी की चौड़ाई कम होने व चट्टान मिलने पर प्रताप चौक से जबड़ापारा चौक के बीच पुल का निर्माण कराया। बताया जाता है कि उस जमाने में सीमेंट नहीं था, इसलिए चूना, गोंद, गिट्टी, रेत के गारे व पत्थर को कटिंग कराकर इस पुल का निर्माण कराया गया। यह ब्रिटिश कॉलीन निर्माण का एक नमूना है। जो 92 साल बाद भी मजबूती से खड़ा हुआ है।
कोनी- तुर्काडीह पुल
लोक निर्माण विभाग ने रिंगरोड बनाकर भारी वाहनों को शहर से बाहर ही बाहर एक मार्ग से दूसरे मार्ग से जोडकऱ निकालने के लिए कोनी और तुर्काडीह के बीच पुल का निर्माण कराने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। मंजूरी मिलने के बाद गत 3 मार्च 2005 को राजधानी रायपुर के सुंदरानी कंस्ट्रक्शन कंपनी को इस पुल के निर्माण के लिए वर्कआर्डर जारी किया गया। कंपनी को कार्य पूर्ण करने के लिए 16 माह का समय दिया गया। ठेका फर्म ने 6 माह विलंब से 3 करोड़ 26 लाख की लागत से इस पुल का निर्माण कार्य 23 जनवरी 2007 को पूर्ण किया। इस पर आवागमन भी शुरू हो गया। इसके बाद 11 जनवरी 2008 को मुख्यमंत्री से इसका लोकार्पण कराया गया। शुरुआत से ही पुल की कमजोरी झलकने लगी थी। पुल के नीचे हो रहे अवैध रेत उत्खनन से इसे और कमजोर किया। मीडिया प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराता रहा। आखिर वही हुआ, जनवरी 2014 में पुल पर दरारें उभर आईं। जिला प्रशासन ने 16 मई 2014 को इस पुल से आवागमन बंद करा दिया। राजधानी से आए लोक निर्माण विभाग के अफसरों ने निरीक्षण के बाद पुल के क्षतिग्रस्त नींव और 9 पियरों की मरम्मत का कार्य शुरू कराया। 3 करोड़ 26 लाख की लागत से बनकर तैयार हुए इस पुल की मरम्मत पर 3 करोड़ 50 लाख रुपए और लग गए। 21 अप्रैल 2016 को इस पुल को मरम्मत कराने के बाद फिर से आवागतन के लिए खोल दिया गया।
फाइल देखने के बाद ही इस सबंध में करूंगा बात
अभी व्यस्त हूं कुछ नहीं बता पाउंगा, आफिस में आइए फाइल देखकर जानकारी दे सकूंगा। तुलनात्मक सवाल पर कुछ नहीं कहूंगा।
वायके सोनकर, कार्यपालन अभियंता सेतु निगम लोक निर्माण विभाग
तुर्काडीह पुल की मरम्मत कराकर चालू कराया गया
ऐसा नहीं है अभी भी मजबूती से निर्माण हो रहा है, टिकाऊ है। जहां तक तुर्काडीह पुल का सवाल है, उसमें जो डिफेक्ट आया था, उसे मरम्मत कराकर चालू करा दिया गया है।
डीके अग्रवाल, सीई, लोक निर्माण विभाग रायपुर
पुल निर्माण एक नजर में ----
पुराना अरपा पुल
बनकर तैयार हुआ- 30 जुलाई 1926 में
लागत- करीब 1 लाख
समयावधि- 2 साल
वर्तमान स्थिति- मजबूती से खड़ा है पुल, आवागमन जारी
कोनी तुर्काडीह पुल
बनकर तैयार हुआ निर्धारित समयावधि से 6 माह विलंब से- 23 जनवरी 2007 को
लागत - 3 करोड़ 26 लाख रुपए
नींव और पियर क्षतिग्रस्त होने से बंद रहा पुल- 2 साल
मरम्मत करवानी पड़ी- वर्ष 2014 में
मरम्मत में खर्च - 3.50 करोड़ रुपए
आईटी खडक़पुर से स्ट्रक्चरल रिपोर्ट आने के बाद - 21 अप्रैल 2016 से चल रहा आवागमन