High Court: कोर्ट ने कहा कि नियमों को कहीं भी और हर जगह शव को दफनाने के अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता। उपरोक्त टिप्पणियों पर विचार करते हुए, न्यायालय ने कहा कि चूंकि ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए 20-25 किलोमीटर की दूरी पर एक अलग कब्रिस्तान उपलब्ध है...
Bilaspur High Court: बिलासपुर हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक ईसाई व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने गांव के आम कब्रिस्तान में अपने मृत पिता का अंतिम संस्कार करने की अनुमति और पुलिस सुरक्षा मांगी थी। कोर्ट ने गांव में शांति भंग की आशंका पर विचार करते हुए कहा कि ईसाई समुदाय का कब्रिस्तान पास के क्षेत्र में उपलब्ध है, इसलिए इस रिट याचिका में याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत देना उचित नहीं होगा। इससे बड़े पैमाने पर जनता में अशांति और वैमनस्य पैदा हो सकता है।
प्रकरण के अनुसार बस्तर के दरभा निवासी याचिकाकर्ता रमेश बघेल के पिता की 7 जनवरी 2025 को मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता और उनके परिवार के सदस्यों ने गांव के आम कब्रिस्तान में ईसाई व्यक्तियों के लिए निर्दिष्ट क्षेत्र में उनका अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई। जैसे ही इस बारे में ग्रामीणों को पता लगा तो वे उग्र हो गए।
ग्रामीणों ने दावा किया कि किसी ईसाई व्यक्ति को उनके गांव में दफनाया नहीं जा सकता, चाहे वह गांव का कब्रिस्तान हो या याचिकाकर्ता की अपनी निजी भूमि। याचिकाकर्ता ने छिंदवाड़ा गांव के ईसाई दफन क्षेत्र में अपने पिता की शांतिपूर्ण अंत्येष्टि सुनिश्चित करने के लिए प्रतिवादी अधिकारियों से सुरक्षा और मदद मांगते हुए आवेदन दिया था। जब याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं मिली, तो उसने हाईकोर्ट की शरण ली।
याचिका में कहा कि छत्तीसगढ़ ग्राम पंचायत नियम, 1999 के प्रावधानों के अनुसार मृत व्यक्ति के धर्म की रीति के अनुसार शवों के निपटान की सुविधा प्रदान करने का कर्तव्य ग्राम पंचायत पर डाला गया है। सुनवाई के दौरान उप महाधिवक्ता ने कहा कि ग्राम छिंदवाड़ा में ईसाइयों के लिए कोई अलग कब्रिस्तान नहीं है। हालांकि, उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि याचिकाकर्ता अपने मृत पिता का अंतिम संस्कार गांव छिंदवाड़ा से 20-25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नजदीकी गांव करकापाल में करता है, जहां ईसाइयों का एक अलग कब्रिस्तान है, तो कोई आपत्ति नहीं होगी।
निजी भूमि में शव को दफनाने की अनुमति के बारे में याचिकाकर्ता के तर्क की विश्वसनीयता की जांच करते हुए, न्यायालय ने जगदीश्वरी बनाम बी. बाबू नायडू मामले में मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें दफनाने के कानूनी प्रश्न पर विचार किया गया था। यह प्रक्रिया निर्दिष्ट भूमि के अलावा किसी अन्य स्थान पर भी हो सकती है, विशेषकर तब जब निर्दिष्ट भूमि गांव में मौजूद हो।
कोर्ट ने कहा कि नियमों को कहीं भी और हर जगह शव को दफनाने के अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता। उपरोक्त टिप्पणियों पर विचार करते हुए, न्यायालय ने कहा कि चूंकि ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिए 20-25 किलोमीटर की दूरी पर एक अलग कब्रिस्तान उपलब्ध है, इसलिए याचिकाकर्ता अपने मृत पिता का अंतिम संस्कार उसी स्थान पर कर सकता है। इस आदेश के साथ ही कोर्ट ने याचिका निराकृत कर दी।