जिले की ऐतिहासिक धरोहर भंडदेवरा संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे मिटती जा रही है।
बडाखेडा. जिले की ऐतिहासिक धरोहर भंडदेवरा संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे मिटती जा रही है। चाकण नदी के किनारे पर खड़ी यह प्राचीन विरासत अब समय, मौसम और उपेक्षा के थपेड़ों से टूटकर बिखरती नजर आ रही है। कभी मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी और दिव्य प्रतिमाएं इस स्थल की पहचान थीं, लेकिन आज वही मूर्तियां पत्थरों के ढेर में तब्दील होती जा रही हैं।
कमलेश्वर महादेव मंदिर (कव्वालजी) से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल इतिहास के पन्नों में 10वीं शताब्दी की स्थापत्य विरासत के रूप में उल्लेखित माना जाता है। वर्षों से उपेक्षा झेल रही यह धरोहर अब जमींदोज होने के कगार पर पहुंच चुकी है। मंदिर परिसर की टूटी दीवारें, बिखरे स्तंभ और क्षतिग्रस्त मूर्तियां मानो अपनी पीड़ा स्वयं बयां कर रही हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार चाकण नदी के दूसरे छोर पर स्थित भंडदेवरा को कमलेश्वर महादेव मंदिर का प्रतीक माना जाता है। यहां की कलात्मक संरचनाएं और शिल्पकारी यह संकेत देती हैं कि यह स्थल प्राचीन काल में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
पत्थर बनते जा रहे मलबा
भंडदेवरा परिसर में मौजूद कलात्मक स्तंभ, प्रतिमाएं और नक्काशीदार पत्थर अब धीरे-धीरे टूटकर बिखरते जा रहे हैं। कभी मंदिर की शोभा बढ़ाने वाली ये प्रतिमाएं आज असहाय होकर मिट्टी में समाती जा रही हैं। कई मूर्तियों के चेहरे, हाथ-पांव और आकृतियां स्पष्ट रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। मंदिर की दीवारों से अलग हुए पत्थर और शिलाएं इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। बारिश, हवा और समय की मार ने मंदिर की संरचना को इतना कमजोर कर दिया है कि हर बीतता दिन इसके अस्तित्व पर नया खतरा बनकर सामने आ रहा है।स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस ऐतिहासिक स्थल की सुध नहीं ली गई तो आने वाले वर्षों में यहां केवल
पत्थरों का ढेर ही दिखाई देगा और भंडदेवरा का नाम इतिहास की किताबों में सिमट कर रह जाएगा।
शिलालेखों में जेत्रसिंह और हम्मीर का उल्लेख
इतिहास के संदर्भ में भंडदेवरा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यहां मिले शिलालेखों में रणथंभौर के शासक राजा जेत्रङ्क्षसह के काल से जुड़े उल्लेख मिलने की बात कही जाती है। मंदिर क्षेत्र में पाए गए शिलालेख संस्कृत और देवनागरी लिपि में लिखे बताए जाते हैं। एक शिलालेख को विक्रम संवत 1345 का माना जाता है, जिसमें कुंड के जीर्णोद्धार तथा उस समय के शासक के बारे में जानकारी होने का उल्लेख किया गया है। इतिहासकारों के अनुसार इसमें राजा जेत्रसिंह और हम्मीर का भी जिक्र मिलता है। ये शिलालेख इस बात का प्रमाण हैं कि भंडदेवरा केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं था, बल्कि उस समय की शासन व्यवस्था, समाज और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक केंद्र भी रहा है।