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सरकारी संरक्षण को तरसती धरोहर, चंबल नदी किनारे बसी पौराणिक धार्मिक नगरी

चंबल नदी किनारे बसी पौराणिक धार्मिक नगरी को देव नगरी के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व एवं शिल्पी की यहां के प्राचीन होने का बोध कराती है।

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Jul 18, 2021
सरकारी संरक्षण को तरसती धरोहर, चंबल नदी किनारे बसी पौराणिक धार्मिक नगरी

सरकारी संरक्षण को तरसती धरोहर, चंबल नदी किनारे बसी पौराणिक धार्मिक नगरी
केशवरायपाटन. चंबल नदी किनारे बसी पौराणिक धार्मिक नगरी को देव नगरी के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व एवं शिल्पी की यहां के प्राचीन होने का बोध कराती है। जगह जगह बिखरी पड़ी अनमोल धरोहर, शिल्पकलाओं की देखकर अब लोगों का मन द्रवित होने लगा है। जिनके कंधों पर इन धरोहरों को बचाने का जिम्मा है वह अपना दायित्व नहीं निभा पा रही है। देखरेख व मरम्मत के अभाव में अब यहां की कलाकृतियां बदरंग हो रही है।
चंबल नदी किनारे बने पौराणिक केशव मंदिर की अनूठी शिल्पकलाओं को बचाने में देवस्थान विभाग व पुरातत्व विभाग विफल हो गया। यहां की मनमोह लेने वाली कलाकृतियां अंग भंग होकर अपनी उपेक्षा पर अपने भाग्य को कोस रही है। मंदिर के शिखर, गृर्भग्रह परिक्रमा, पुराने चबूतरों, घाटों पर जो उत्कृष्ट कलाकृतियां थी वह समय के साथ नष्ट होती जा रही है। सैकड़ों साल पुरानी शिल्पी कलां के पत्थर कई स्थानों से गायब हो चुके हैं।
सिर मुंडवाते ही पड़े ओले
कहते हैं कि कभी वह समय भी आता है जब भाग्य बदलता है, लेकिन यहां तो भगवान का भाग्य ही बदलते बदलते रह गया। प्राचीन केशव मंदिर की शिल्प कलाओं को बचाने के लिए तत्कालीन सरकार ने पांच करोड़ स्वीकृत किए थे, लेकिन यह लग नहीं पाए। बजट की कमी के साथ-साथ शिल्पकलाओं की हूबहू निर्माण नहीं करने से ठेकेदार काम छोड़ कर चला गया। तमाम प्रयासों के बावजूद कलाकृतियों को नहीं बचाने का मलाल है।
अंधेर नगरी
अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत कस्बे के लिए उचित तक साबित हो रही है। राज्य सरकार पांच साल पहले केशव धाम को हरिद्वार की तर्ज पर बनाने के लिए 5 करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे। चुनावी साल में स्वीकृत यह बजट चुनावी जुमला बनकर रह गया। शासन व प्रशासन की अनदेखी के चलते यह बजट नहीं लग पाया। राज्य सरकार केवल चंबल के किनारे छत्रियां बनाने में 50 लाख रुपए खर्च कर चुकी थी जो भी पानी में बह गए।

Published on:
18 Jul 2021 08:48 pm
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