केंत, कैथा या वुड एप्पल एक अत्यंत गुणकारी औषधीय पेड़ है जिसकी संख्या बूंदी में गिनती की रह गई है। कुछ वर्षों पहले तक यह पेड़ हर गांव-ढाणी, खेत-खलिहान व जंगलों में आसानी से दिख जाया करते थे, लेकिन देखते ही देखते इनकी संख्या कम हो गई।
गुढ़ानाथावतान. केंत, कैथा या वुड एप्पल एक अत्यंत गुणकारी औषधीय पेड़ है जिसकी संख्या बूंदी में गिनती की रह गई है। कुछ वर्षों पहले तक यह पेड़ हर गांव-ढाणी, खेत-खलिहान व जंगलों में आसानी से दिख जाया करते थे, लेकिन देखते ही देखते इनकी संख्या कम हो गई। आफरी जोधपुर के वैज्ञानिक इस पेड़ की वस्तुस्थिति का राज्य के सभी जिलों में सर्वे कर रहे है तथा इसके पेड़ों पर नंबर भी डाल रहे हैं। इससे राज्य में इन पेड़ों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकेगा तथा संरक्षण की योजना बनेगी। इस पेड़ के फलों, पत्तियों, छाल, जड़ और गोंद का उपयोग हजारों वर्षों से आयुर्वेद में पाचन विकार, दस्त, मधुमेह, लिवर और किडनी संबंधी बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है।
कोटा की कचौरी में कथौड़ी का कमाल
कोटा की कचोरी के प्रसिद्ध होने में केंत की खट्टी चटनी का ही कमाल है। बच्चे इसको पकने पर पत्थर से तोडक़र चाव से खाते हैं और शरबत आदि भी बना सकते हैं। इसका सूखा पाउडर कथौड़ी के रूप में विभिन्न सब्जियों व पकवानों में काम आता है।
बूंदी में बचे गिनती के पेड़
शुष्क वन अनुसंधान केंद्र (आफरी) जोधपुर की टीम के द्वारा गत सप्ताह जिले में इसकी वस्तुस्थिति का सर्वे किया गया। जिसमें करीब एक दर्जन पेड़ दर्ज किए जा सके। इस पेड़ की तरह परम्परागत इमली के पेड़ भी कम दिखने लगे हैं। इसके अलावा बूंदी की प्रसिद्ध रेणी के नए पेड़ भी तैयार नहीं हो पा रहे हैं तथा जिले से बीजा के पेड़ तो लगभग खत्म ही हो गए हैं। इन दुर्लभ औषधीय गुणों वाले पेड़ पौधों का संरक्षण किया जाना आवश्यक है, ताकि जैवविविधता में संतुलन बना रहे और गह हम सभी का सामूहिक दायित्व भी बनता है।