
अक्टूबर 2021 से अक्टूबर 2026 के बीच बिटकॉइन ने करीब 183 फीसदी का छप्परफाड़ रिटर्न देकर सबको पीछे छोड़ दिया। सोना भी पीछे नहीं रहा और इसने 131 फीसदी की तगड़ी उछाल दर्ज की। इसके उलट, भारतीय शेयर बाजार का बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी-50 इस दौरान महज 26 फीसदी के आसपास ही बढ़ पाया। बिटकॉइन पांच साल पहले करीब 29,000 डॉलर पर था और आज 82,600 डॉलर के पार निकल चुका है। यह लगभग 23 फीसदी सालाना की बढ़त है। यानी 5 साल में बिटकॉइन ने 183 फीसदी रिटर्न दिया है। नंबर देखने में जितने लुभावने हैं, इसकी राह उतनी ही पथरीली रही है। 2022 का वह दौर याद कीजिए जब क्रिप्टो की दुनिया में कोहराम मचा था, कई कंपनियां दिवालिया हो गई थीं और ब्याज दरों के डर से निवेशकों के पसीने छूट गए थे।
इसके बाद जब अमेरिकी बाजार में स्पॉट बिटकॉइन ईटीएफ आए, 2024 में Bitcoin halving हुई और बड़े संस्थानों ने खरीदारी शुरू की, तब जाकर गाड़ी पटरी पर लौटी। आज बिटकॉइन 84,000 डॉलर के करीब ट्रेड कर रहा है। लेकिन ध्यान रहे, यहां जितनी तेजी से पैसा बनता है, उतनी ही तेजी से डूबता भी है। क्रिप्टोकरेंसी अत्यधिक जोखिम भरा निवेश विकल्प है।
भारतीय घरों में सोने को केवल जेवर नहीं, बल्कि आड़े वक्त का साथी माना जाता है। पिछले पांच वर्षों में सोने ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ तिजोरी में बंद रखने की चीज नहीं, बल्कि भारी रिटर्न भी दे सकता है। अक्टूबर 2021 में सोना लगभग 1,796 डॉलर प्रति औंस पर था, जो आज 4,142 डॉलर के करीब पहुंच गया है। यानी 131 फीसदी का दमदार मुनाफा। दुनिया भर में बढ़ती महंगाई, देशों के बीच तनाव और केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनी तिजोरियों में सोने का भंडार बढ़ाने की होड़ ने इसे नई ऊंचाई दी। जब भी दुनिया में अनिश्चितता का माहौल बना, निवेशकों ने सोने को गले लगाया।
कोरोना के बाद शेयर बाजार जिस रफ्तार से दौड़ा था, उसके बाद गिरावट आना तय था। अक्टूबर 2021 में निफ्टी लगभग 18,115 पर था और अब 22,700 के करीब है। पांच साल में 26 फीसदी की कुल बढ़त का मतलब है, सालाना 5 फीसदी से भी कम का रिटर्न। क्या इसका मतलब यह है कि भारतीय बाजार की चमक फीकी पड़ गई? बिल्कुल नहीं। सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार डॉ रवि सिंह के अनुसार, असल में बाजार पहले ही काफी महंगा हो चुका था। इसके बाद विदेशी निवेशकों की बिकवाली और ऊंचे वैल्यूएशन के चलते बाजार में ठहराव देखने को मिला। भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था, कंपनियों की कमाई और खपत की ताकत आज भी मजबूत है। बाजार कभी एक सीधी रेखा में नहीं चलता, इसलिए सिर्फ पिछले पांच साल के सुस्त रिटर्न को देखकर देश की ग्रोथ स्टोरी पर सवाल उठाना जल्दबाजी होगी।
डॉ सिंह के अनुसार, किसी एक निवेश विकल्प पर दांव लगाना समझदारी नहीं है। इन तीनों एसेट्स की डोर काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों और बॉन्ड यील्ड से बंधी हुई है। ब्याज दरों का बढ़ता दबाव शेयरों और गोल्ड दोनों की रफ्तार पर ब्रेक लगाता है, जबकि बिटकॉइन भी अब काफी हद तक टेक शेयरों के मिजाज के साथ कदमताल करता है।
पीएल वेल्थ की सलाह है कि मौजूदा हालात में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और ब्याज दरों की अनिश्चितता को देखते हुए धीरे-धीरे लार्ज कैप और चुनिंदा मिड कैप शेयरों में पैसा लगाना चाहिए। लॉन्ग टर्म के लिए भारत की डिफेंस, बैंकिंग और कंज्यूमर कंपनियों की स्थिति मजबूत दिखती है। मार्केट एक्सपर्ट्स सारा पैसा एक ही जगह रखने के मना करते हैं। यानी अपने पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन रखना चाहिए।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)