RBI Repo Rate: इस हफ्ते आम जनता को राहत मिली है। सरकार ने बजट में टैक्स छूट बढ़ाई, वहीं RBI ने रेपो रेट में 0.25% की कमी की है। इससे कर्ज सस्ता हो सकता है, जिससे उपभोग और निवेश को बढ़ावा मिल सकता है।
RBI Repo Rate: आम जनता के लिए इस हफ्ते दोहरी खुशी की खबर आई है। एक तरफ सरकार ने बजट में टैक्स में कटौती करके राहत दी, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट में 0.25% (25 बेसिस प्वाइंट) की कमी की घोषणा की है, जिससे कर्ज सस्ता हो सकता है। नए रेपो रेट के अनुसार, यह 6.5% से घटकर 6.25% हो गया है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब देश की आर्थिक बढ़ोतरी दर धीमी पड़ रही थी और उपभोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि टैक्स कटौती और ब्याज दर में कमी से घरेलू मांग में बढ़ोतरी होगी, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। पिछले पांच वर्षों में यह पहली बार है जब रेपो रेट में 0.25% की कमी की गई है, जिसके परिणामस्वरूप ईएमआई, कार लोन और होम लोन सस्ते हो सकते हैं। इस कदम से आम आदमी को राहत मिल सकती है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2025 में आयकर छूट (RBI Repo Rate) की सीमा को ₹12 लाख तक बढ़ाकर मध्यम वर्ग को राहत दी है। इस कदम से सरकार को लगभग ₹1 लाख करोड़ के कर राजस्व का नुकसान होगा, लेकिन इससे लोगों के पास अधिक डिस्पोजेबल इनकम होगी, जो उपभोग और निवेश को बढ़ावा देगी। दूसरी ओर, आरबीआई द्वारा ब्याज दरों में कटौती से होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन सस्ते होंगे। इससे रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और अन्य उद्योगों में मांग बढ़ने की संभावना है। आरबीआई गवर्नर ने कहा, मुद्रास्फीति और विकास दर के संतुलन को बनाए रखने के लिए नीतिगत दरों में 25 आधार अंकों की कटौती की गई है। इसका उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में कर राहत और रेपो रेट (RBI Repo Rate) में कटौती से उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ेगी, जिससे बाजार में मांग में इजाफा होगा। यह खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में अधिक असरदार साबित हो सकता है, जहां महंगाई और आय में गिरावट की वजह से उपभोग कमजोर पड़ा था। टैक्स कटौती (RBI Repo Rate) से जहां वेतनभोगी और मध्यम वर्ग को राहत मिलेगी, वहीं रेपो रेट कटौती से उद्योगों और स्टार्टअप्स को सस्ते में कर्ज मिलेगा। इससे निवेश और उत्पादन में वृद्धि होगी, जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
भारत की GDP बढ़ोतरी दर दूसरी तिमाही में 5.4% थी, लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 के लिए सरकार ने इसे 6.4% पर अनुमानित किया है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) का मानना है कि दरों में कटौती से यह लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।
आरबीआई का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 में मुद्रास्फीति दर 4.2% पर बनी रह सकती है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट और स्थिर आपूर्ति से महंगाई नियंत्रित रहने की संभावना है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों का असर महंगाई पर पड़ सकता है। अगर वैश्विक स्तर पर कोई बड़ा झटका लगता है, तो आरबीआई को अपनी नीति (RBI Repo Rate) पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।
PwC इंडिया के इकनॉमिक एडवायजरी प्रमुख रानेन बनर्जी ने कहा, MPC को मुद्रास्फीति में स्थिरता से राहत मिली है। बजट में कर राहत और आरबीआई की मौद्रिक नीति मिलकर मांग को बढ़ावा दे सकती हैं और GDP वृद्धि को 6.3% से 6.8% तक ले जा सकती हैं।
सरकार और आरबीआई (RBI Repo Rate) की यह संयुक्त रणनीति विकास को प्राथमिकता देती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर धीरे-धीरे दिखेगा और इसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उपभोक्ता खर्च और निवेश कितना बढ़ता है। RBI और सरकार की यह नीतिगत तालमेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। अब देखना होगा कि यह निर्णय महंगाई को नियंत्रित रखते हुए विकास दर को किस हद तक आगे ले जा सकता है।