
UPI पर चार्ज लगाने की चर्चा ने अब एक नई बहस छेड़ दी है। भारत पे के पूर्व को-फाउंडर अशनीर ग्रोवर ने संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अगर यूपीआई पेमेंट पर फीस शुरू हुई तो इसका असर सीधे ग्राहकों और दुकानदारों पर पड़ सकता है। ग्रोवर का कहना है कि यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत ही इसका फ्री होना है। अगर बड़े पेमेंट पर चार्ज लगने लगा तो ग्राहक और व्यापारी दोबारा कैश की ओर जा सकते हैं। इससे एक तरफ डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने की कोशिशों को झटका लग सकता है, वहीं बैंकों और कारोबारियों पर कैश संभालने का खर्च भी बढ़ सकता है
उनकी यह टिप्पणी सरकार की उस अधिसूचना के बाद आई है, जिसमें 2,000 रुपये तक के यूपीआई ट्रांजैक्शन और रुपे डेबिट कार्ड पेमेंट पर डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से चार्ज लगाने पर रोक की बात कही गई है।
अशनीर ग्रोवर ने 2,000 रुपये की सीमा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका दावा है कि 2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजैक्शन संख्या के हिसाब से भले ही कम हों, लेकिन यूपीआई के कुल लेनदेन की रकम में उनका हिस्सा काफी बड़ा है। उन्होंने कहा कि 2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजैक्शन कुल संख्या के करीब 4 फीसदी हैं, लेकिन कुल वैल्यू में इनकी हिस्सेदारी लगभग 66 फीसदी है। उनके मुताबिक ऐसे में इसी हिस्से पर MDR लगाने की चर्चा का असर काफी बड़ा हो सकता है। ग्रोवर ने इसे लेकर सवाल किया कि आखिर जिस पेमेंट सिस्टम ने भारत में डिजिटल भुगतान को इतनी तेजी से आगे बढ़ाया, उसमें दोबारा शुल्क लगाने की जरूरत क्यों पड़ रही है। उनका कहना है कि फ्री यूपीआई ही असली यूपीआई है। अगर पेमेंट पर फीस लगने लगी तो इसकी लोकप्रियता पर असर पड़ सकता है।
ग्रोवर ने संभावित एमडीआर का असर समझाते हुए कहा कि दुकानदार यह लागत ग्राहकों से वसूल सकते हैं। मसलन, अगर किसी बड़े यूपीआई पेमेंट पर शुल्क लगता है तो व्यापारी ग्राहक से अतिरिक्त रकम मांग सकता है। एक दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि ग्राहक से यूपीआई के बजाय कैश में भुगतान करने को कहा जाए। ऐसे में डिजिटल पेमेंट की जगह नकद लेनदेन फिर बढ़ सकता है। ग्रोवर के मुताबिक अगर कैश का इस्तेमाल बढ़ा तो बैंकों को ज्यादा कैश संभालना पड़ेगा। ज्यादा एटीएम, ज्यादा कैश मैनेजमेंट और उससे जुड़ी लागत बढ़ सकती है। यानी यूपीआई पर चार्ज से जो पैसा बचाने की कोशिश होगी, उसका कुछ हिस्सा दूसरी तरफ कैश संभालने में खर्च हो सकता है।
ग्रोवर ने एक और संभावित स्थिति की ओर इशारा किया। अगर बड़े यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर लगता है तो लोग रकम को छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन में बांट सकते हैं। उदाहरण के लिए 12,000 रुपये का भुगतान एक साथ करने के बजाय ग्राहक कई छोटे यूपीआई पेमेंट कर सकता है। इससे सिस्टम में ट्रांजैक्शन की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन चार्ज से बचने की कोशिश भी हो सकती है। ग्रोवर के मुताबिक दुकान पर होने वाला सामान्य पेमेंट इतना जटिल मामला नहीं है कि उसके लिए ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ डाला जाए।
14 सितंबर की गजट अधिसूचना के मुताबिक बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन और RuPay डेबिट कार्ड से होने वाले पेमेंट पर भुगतान करने या प्राप्त करने वाले व्यक्ति से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकते। यह बदलाव पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट, 2007 की धारा 10A में संशोधन के बाद आया है। हालांकि, अधिसूचना में 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर संभावित शुल्क को लेकर पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। खासकर बड़े मर्चेंट पेमेंट पर एमडीआर को लेकर आगे क्या व्यवस्था बनेगी, इस पर अभी चर्चा बाकी है। अब तक यूपीआई ट्रांजैक्शन पर रकम चाहे जितनी हो, मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू नहीं किया गया है।
यूपीआई पर संभावित चार्ज का विरोध करते हुए ग्रोवर ने आरबीआई से सरकार को ट्रांसफर किए गए सरप्लस और बैंकों के मुनाफे का भी हवाला दिया। उन्होंने आरबीआई के करीब 2.87 लाख करोड़ रुपये के सरप्लस ट्रांसफर, लिस्टेड बैंकों के करीब 4.11 लाख करोड़ रुपये के कुल मुनाफे और NPCI के करीब 1,888 करोड़ रुपये के प्री-टैक्स सरप्लस का उल्लेख किया। उनका सवाल था कि अगर बैंकिंग और पेमेंट सिस्टम पहले से इतना बड़ा कारोबार कर रहा है तो UPI को लेकर सरकार को किस तरह के नुकसान की भरपाई करनी है। यह ग्रोवर का तर्क है, जबकि सरकार का जोर यूपीआई के तेजी से बढ़ते नेटवर्क की भविष्य की लागत और इसके लिए स्थायी कमाई का मॉडल तैयार करने पर है।