
राजेंद्र सिंह जादौन की रिपोर्ट...
(चंडीगढ): सिख धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी करने वाले को आजीवन कारावास की सजा के प्रावधान वाला पंजाब विधानसभा का विधेयक केंद्र ने नामंजूर कर दिया है। केंद्र ने कारण यह बताया है कि यह सिर्फ सिखिज्म के अपमान पर ही आधारित है।
बेअदबी की जांच के लिए आयोग का गठन
कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने प्रदेश में वर्ष 2015 में हुई गुरूग्रंथ साहिब के अपमान की घटनाओं की जांच के लिए पिछले साल जस्टिस रिटायर्ड रणजीत सिंह आयोग का गठन किया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी। रिपोर्ट में बेअदबी की घटनाओं के लिए डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियो और खासकर डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के विश्वस्त लोगों की ओर अंगुली उठाई गई। आयोग ने वर्ष 2015 में मई से अक्टूबर तक फरीदकोट जिले के बुर्ज जवाहर सिंहवाला, बरगरी, गुरसर, मालिके, बेहबल कला गांवों में हुई बेअदबी की घटनाओं की जांच की है।
पिछली सरकार ने भी गठित किया था आयोग
इससे पहले पिछली अकाली-भाजपा सरकार ने भी बेअदबी की घटनाओं की जांच के लिए जस्टिस रिटायर्ड जोरा सिंह आयोग का गठन किया था। जोरा सिंह आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट 30 जून 2016 को सौंप दी थी। लेकिन अमरिंदर सरकार ने इस रिपोर्ट को अधूरा बताते हुए खारिज कर दिया था। साथ ही अप्रेल 2017 में रणजीत सिंह आयोग का गठन किया था। हालांकि जस्टिस रणजीत सिंह ने सरकार को सौंपी गई अंतिम रिपोर्ट का खुलासा नहीं किया है लेकिन जो जानकारी लीक होकर आई है, उसके अनुसार बुर्ज जवाहर सिंह वाला एवं बरगरी में हुई गुरूग्रंथ साहिब के अपमान की घटनाओं में डेरा अनुयायियों का हाथ रहा है।
सिख पंथ और डेरा सच्चा सौदा के बीच वर्ष 2007 से ही तनावपूर्ण रिश्ते हैं। वर्ष 2007 में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के दसवें सिख गुरू गोविन्दसिंह की तरह पोशाक पहनने पर इस तनाव की शुरूआत हुई थी। इस पर अकाल तख्त ने डेरा के सामाजिक बहिष्कार का हुक्मनामा जारी किया था। समय बीतने के साथ अकाल तख्त ने डेरा प्रमुख को इस धार्मिक अपराध के लिए माफी दे दी थी। लेकिन इसे सिख पंथ ने मंजूर नहीं किया था और अकाल तख्त ने माफी रद्द कर दी थी।