
चेन्नई. श्री विष्णुमोहन फाउंडेशन तथा भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद के तत्वावधान में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत गुरुवार को आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में हुई। सम्मेलन का विषय लिविंग इन हार्मोनी विथ नेचर (21वीं शताब्दी के लिए जैन विजन) रखा गया है। इस मौके पर आचार्य महाश्रमण ने नैतिकता और आर्थिक शुचिता की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा अच्छी बात का सम्मान हो। सभी प्राणियों में मैत्रीभाव हो। मानव सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, वह केवल ज्ञान प्राप्त कर सकता है। उसके पास एक अच्छा दिमाग है। उसमें हिंसा और अहिंसा दोनों के संस्कार हैं। उन्होंने पानी और बिजली की बचत की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि संयम का अभ्यास होना चाहिए। विवेक और अनुकंपा की भावना जाग्रत करें। अहिंसा यात्रा के दौरान सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का प्रचार किया जा रहा है।
इससे पहले पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि सारा विश्व शांति की खोज में भटक रहा है। फिर भी अशांति बढ़ रही है क्योकि व्यक्ति चेतन है और जड़ शरीर के रूप में जीता है। शरीर पर त्रिगुण के प्रभाव झलकते हैं। आत्मा जिन कर्मों के फल भोगता है, वह भी शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं।
शरीर को अभ्युदय चाहिए जहां शांति का रूप सुख तक सीमित है। चेतना का लक्ष्य नि:श्रेयस है। यही स्थाई शांति का आधार है। उन्होंने कहा प्रकृति स्वयं में संतुलित है, हमारी पोषक है। प्रकृति का दुरुपयोग न करें। योग एवं क्षेम द्वारा हमें प्रकृति का सदुपयोग करना चाहिए। जैन दर्शन के महनीय तत्व विश्व स्तर पर प्रचारित प्रसारित करें तभी शांति, सुख और सुरक्षा मिलेगी। उसे समझे और व्यवहार में लाएं। हम भूल गए हैं कि हम चेतना है। शरीर के सहारे शांति चाहते हैं। चेतना की चर्चा न तो स्कूल में है और न ही घरों में। शिक्षा बौद्धिकवाद पर आधारित है। शब्दों को समझें और आत्मसात करें। इससे पहले समणी पुण्यप्रज्ञा के मंगलगान से कार्यक्रम की शुरुआत के बाद श्री विष्णुमोहन फाउंडेशन के संस्थापक स्वामी हरिप्रसाद ने उद्बोधन दिया। स्वागत भाषण भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद के चेयरपर्सन प्रो.एस.आर. भट्ट ने दिया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए अशोक बाफना ने कहा आज भौतिक संस्कृति से आध्यात्मिक संस्कृति की ओर से जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा आज दुनिया में बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके समाधान की जरूरत पर बल दिया।
उन्होंने इस सम्मेलन के आयोजन की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। सम्मेलन के डाइरेक्टर प्रो.एस. पन्नीरसेल्वम ने भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जैन धर्म मानवता को मागदर्शन देता है। दुनिया की सारी समस्याओं का समाधान जीओ और जीने दो में है। इससे सतत विकास होता है। इसके अलावा अन्य सत्र के वक्ताओं में प्रो. के. श्रीनिवासन, कलैसेल्वन, राजू मेहता, देबिका शाहा, एस. एल. गांधी, प्रो.के.संपत कुमार, सुगालचंद जैन तथा डा. एस. मणिकंडन शामिल थे। इस मौके पर शांतिलाल गुलेच्छा भी उपस्थित थे।