
Madras High Court RSS March: मद्रास हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विजयादशमी रूट मार्च को अनुमति देने से इनकार करने के लिए मस्जिदों की मौजूदगी और अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर आशंकाओं का हवाला देने पर तमिलनाडु पुलिस पर नाराजगी जताई है। जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि पुलिस इस तरह पेश कर रही है, मानो अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को RSS के जुलूसों से परेशानी हो। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने टिप्पणी की, 'मुसलमानों को बदनाम न करें।'
बॉर एंड बेंंच की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत जगदीसन बनाम राज्य मामले में RSS की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें संगठन ने तमिलनाडु में विजयादशमी के अवसर पर रूट मार्च निकालने की अनुमति देने से इनकार किए जाने को चुनौती दी थी। RSS ने राज्य में 128 स्थानों पर मार्च निकालने की अनुमति मांगी थी, लेकिन पुलिस केवल 58 स्थानों पर अनुमति देने को तैयार थी।
जस्टिस लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि पहले भी हाईकोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि जुलूस के रास्ते में मस्जिदों और चर्चों की मौजूदगी, ट्रैफिक जाम की आशंका या RSS के विचारों का विरोध करने वाले संगठनों की मौजूदगी अपने आप में मार्च की अनुमति से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत ने याद दिलाया कि जस्टिस जी. जयचंद्रन ने अपने पहले के फैसले में ऐसे कारणों को कमजोर आधार बताया था। इसके बावजूद पुलिस ने फिर लगभग उन्हीं कारणों के आधार पर आवेदन खारिज कर दिए।
न्यायाधीश ने कहा कि यह दुखद है कि पुलिस अधिकारी इस तरह उल्लेख कर रहे हैं, जैसे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को याचिकाकर्ता संगठन के जुलूस से समस्या है। सुनवाई के दौरान उन्होंने यह भी पूछा कि क्या मुस्लिम समुदाय के किसी सदस्य ने वास्तव में प्रस्तावित RSS मार्च पर आपत्ति जताई थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस लक्ष्मीनारायणन ने प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़ी घटनाओं का हवाला देकर RSS के मार्च का विरोध करने पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसे आधारों पर अनुमति रोकने का औचित्य स्पष्ट होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने तमिलनाडु में RSS के रूट मार्च को लेकर 2022 से चल रही कानूनी लड़ाई का भी उल्लेख किया। अदालत ने बताया कि सितंबर 2022 में हाईकोर्ट ने मार्च की अनुमति दी थी और बाद में 11 अप्रैल 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की चुनौती खारिज कर दी थी। इसके बाद भी इसी तरह के विवाद अदालत पहुंचते रहे। जस्टिस जयचंद्रन ने 11 मार्च 2024 को कुछ दिशा-निर्देश तय किए थे, ताकि अनुमति को लेकर बार-बार मुकदमेबाजी से बचा जा सके। हालांकि, मौजूदा सुनवाई में हाईकोर्ट ने पाया कि RSS और राज्य प्रशासन, दोनों ही इन दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे थे।
अदालत ने कहा कि RSS की ओर से दिए गए आवेदनों में वैकल्पिक रास्तों, जुलूस के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और सार्वजनिक सभाओं के आयोजकों जैसी जरूरी जानकारियां नहीं थीं। जस्टिस लक्ष्मीनारायणन ने टिप्पणी की कि पक्षकारों पर अदालत का भरोसा शायद पूरी तरह सही साबित नहीं हुआ। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे विवादों में बार-बार सुनवाई से अदालत का काफी समय खर्च हो रहा है, जबकि दिशा-निर्देशों का पालन करके इससे बचा जा सकता था।
विवाद के समाधान के लिए हाईकोर्ट ने RSS को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसमें प्रस्तावित मार्ग, संभावित प्रतिभागियों की संख्या और स्थानीय आयोजकों का विवरण देना होगा। संगठन को यह आश्वासन भी देना होगा कि वह हाईकोर्ट की ओर से तय शर्तों का सख्ती से पालन करेगा।
पहले 18 अक्टूबर को प्रस्तावित मार्च अब उत्तरी जिलों में 25 अक्टूबर और दक्षिणी जिलों में 1 नवंबर को आयोजित करने के लिए टाल दिए गए हैं। अदालत ने महाधिवक्ता से कहा है कि हलफनामा मिलने के बाद पुलिस महानिदेशक (DGP) से निर्देश प्राप्त करें। स्थानीय RSS आयोजकों को भी संबंधित पुलिस अधीक्षकों को आवश्यक जानकारी देने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को होगी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वी. चंद्रशेखरन के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एल. राजा अदालत में पेश हुए।