चेन्नई

भारत ही नहीं दुनिया भर के कई देशों में पढ़ाई जा रही है हिंदी

भारत के बाहर विदेशों में भी हिंदी को लेकर लोगों की रूचि बढ़ रही है। कई विश्वविद्यालयों एवं कालेजों में हिंदी अध्यापन की सुविधा उपलब्ध कराई....

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Not only in India

चेन्नई।भारत के बाहर विदेशों में भी हिंदी को लेकर लोगों की रूचि बढ़ रही है। कई विश्वविद्यालयों एवं कालेजों में हिंदी अध्यापन की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। पिछले कुछ समय से इटली में भी हिंदी के प्रति लोगों की जागरूकता में बढ़ी है। यह बात टीनगर स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद ओरियंटल विश्वविद्यालय इटली की शोधार्थी अन्नालिसा बोचेट्टी ने कही। भारत एवं इटली के पुराने संबंधों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वहां कई विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है।

इससे पूर्व उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर संजय एल. मादार ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन के लिए उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान में हर महीने व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है। कार्यक्रम के अंत में सहायक प्रोफेसर डा. सविता धुडक़ेवार ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान रीडर डा. पी. नजीम बेगम, सहायक प्रोफेसर डा. बी. संतोषी, डा. शक्तिकुमार द्विवेदी के अलावा विभाग के विद्यार्थी एवं शोधार्थी भी मौजूद थे।

किसानों और कुम्हारों के लिए वरदान साबित हो रही है जलाशयों की गाद

जिले भर की झीलों एवं तालाबों से गाद निकालने का काम यहां के किसानों एवं कुम्हारों के लिए वरदान साबित हो रहा है। नल्लमपल्ली में जैविक खेती को बढ़ावा देने वाले शिवा नामक एक कार्यकर्ता ने बताया कि इसके चलते जहां एक तरफ किसानों को अपने खेतों के लिए उपजाऊ मिट्टी प्राप्त हो रही है वहीं कुम्हारों को बर्तन बनाने के लिए कच्चा माल भी मिल जा रहा है। उसने आगे बताया कि कृषि कार्य में जलोढ़ मिट्टी का अपना विशेष स्थान है। बाढ़ के दौरान नदियों एवं तालाबों का पानी खेतों की ऊपरी एवं उपजाऊ परत को बहा ले जाता है।

आगे चलकर यह उपजाऊ मिट्टी गाद बनकर इन नदियों एवं तालाबों की तलछटी में जमा हो जाता है। उन्होंने बताया कि पहले के लोग खेती करने के लिए इस तरह की मिट्टी का खूब प्रयोग किया करते थे। कम पानी में भी इस मिट्टी में अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। पिछले कुछ सालों से चल रहे भयंकर सूखे में ये किसानों के लिए काफी मददगार साबित हो सकती है। उन्होंने बताया कि रासायनिक खाद की तरफ से इक्कीसवीं सदी के किसानों का मोह भंग होना शुरू हो गया है। ऐसे में सरकार द्वारा किसानों को तालाबों आदि जल निकायों से जलोढ़ मिट्टी निकालने की अनुमति देना उनके लिए वरदान साबित हो रहा है।

उन्होंने इस मिट्टी के लाभ के बारे में बताते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों के पौधों की अपेक्षा जलोढ़ मिट्टी में उगाए गए पौधे दस गुने स्वस्थ होते हैं। इसके अलावा प्रकृति प्रदत्त होने की वजह से यह बीमारियों को भी कम करता है। खेती के अलावा यह मिट्टी कुम्हारों के लिए भी कम मददगार नहीं है। धर्मपुरी निवासी नागराजन नामक कुम्हार ने बताया कि गाद की मिट्टी से बनाए गए बर्तनों की गुणवत्ता काफी अच्छी होती है।

निर्धारित मात्रा में मिट्टी निकालने की सरकारी अनुमति मिलने के बाद से वे बर्तन बनाने के लिए इसी मिट्टी का उपयोग कर रहे हैं। गाद निकालने की परियोजना में तहसीलदार के अधीनस्थ कार्यरत एक सहायक अभियंता ने बताया कि खेतों की निकटता के आधार पर किसानों को जलाशयों से 30 क्यूबिक फुट तक गाद निकालने की अनुमति दी गई है।

गाद निकालने से पहले उन्हें अधिकारियों से इसे बर्बाद नहीं होने देने का वादा करते हुए अनुमति प्राप्त करना होता है। उन्होंने बताया कि वैसे तो किसानों को यह मिट्टी मुफ्त दी जाती है लेकिन लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की निगरानी में उन्हें परिवहन लागत के रूप में उन्हें इसके लिए कुछ भुगतान करना पड़ता है।

Published on:
07 May 2018 09:53 pm
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