सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति ने राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करने की सिफारिश की है। इस समिति की 387 पृष्ठों की रिपोर्ट बुधवार को मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने विधानसभा में प्रस्तुत की। रिपोर्ट में राज्यपाल के चयन, भाषा नीति, परिसीमन, चुनाव, शिक्षा, […]
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति ने राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करने की सिफारिश की है। इस समिति की 387 पृष्ठों की रिपोर्ट बुधवार को मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने विधानसभा में प्रस्तुत की। रिपोर्ट में राज्यपाल के चयन, भाषा नीति, परिसीमन, चुनाव, शिक्षा, स्वास्थ्य और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) सुधार सहित दस महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं।रिपोर्ट के अनुसार, राज्यपाल के लिए पांच वर्ष की एकल अवधि तय करने की अनुशंसा की गई है। इसके लिए राज्य विधानसभा की पूर्ण सदस्यता से बहुमत से अनुमोदित तीन नामों में से राष्ट्रपति को एक को राज्यपाल नियुक्त करने का प्रस्ताव है। यह अनुशंसा संविधान के अनुच्छेद 155 में संशोधन का सुझाव देती है।मुख्यमंत्री स्टालिन ने रिपोर्ट के प्रस्तावना में कहा, “इसका विश्लेषण संविधान सभा की बहसों, संघीय अध्ययन, पूर्व आयोगों की रिपोर्ट, न्यायिक निर्णयों और समकालीन अनुसंधान पर आधारित है। इसकी सिफारिशें सहायकता, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक प्राथमिकता के सिद्धांतों तथा परिपक्व संघों की सर्वोत्तम प्रथाओं पर आधारित हैं।”संवैधानिक संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत पर जोर
संवैधानिक संशोधनों को लेकर समिति ने अनुच्छेद 368(2) के तहत प्रत्येक संशोधन विधेयक के लिए संसद के प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता पर बल दिया है। जिन संशोधनों से किसी विशेष राज्य पर प्रभाव पड़ेगा, उनके लिए संबंधित राज्य की विधानसभा की कुल सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत से अनुमोदन अनिवार्य बताया गया है।
समिति ने यह भी सिफारिश की है कि जिन संवैधानिक प्रावधानों में साधारण बहुमत से संशोधन संभव है, उन्हें न्यूनतम किया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि इससे केंद्र सरकार विचारधारा आधारित या राजनीतिक रूप से प्रेरित संशोधनों को आसानी से पारित नहीं कर सकेगी।
राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी को स्वतंत्र भाषा माना जाए
भाषा नीति पर रिपोर्ट में केंद्र सरकार से जनगणना में 53 स्वतंत्र भाषाओं जिनमें भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मगही शामिल हैं को हिंदी की उपबोली के रूप में गलत वर्गीकरण समाप्त करने और हिंदी भाषियों का सटीक प्रतिशत प्रस्तुत करने का आग्रह किया गया है। रिपोर्ट में राज्य द्वारा हिंदी थोपने के विरोध को दोहराया गया और “एक राष्ट्र, एक भाषा” के सिद्धांत को त्यागने की बात कही गई। समिति ने कहा, “एकता समानता से आती है, भाषायी एकरूपता से नहीं।
”जीएसटी में संशोधन
वस्तु एवं सेवा कर परिषद (जीएसटी) के संदर्भ में समिति ने अनुच्छेद 279ए की उपधारा (7) और (9) में संशोधन कर संघीय संतुलन बहाल करने पर जोर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, “परिषद में निर्णय प्रक्रिया को लकवाग्रस्त करना उद्देश्य नहीं है, बल्कि एकपक्षीयता को रोकना, वास्तविक सहमति सुनिश्चित करना और सहकारी संघवाद के संवैधानिक वादे के अनुरूप परिषद का पुनर्संयोजन करना जरूरी है।” समिति ने उच्च कोरम, साझेदारी मॉडल के तहत वेटेड पुनर्संतुलन और ‘एक सदस्य, एक मत’ जैसी विभिन्न विकल्पों पर सुझाव दिए हैं।
केंद्र अपनी परियोजनाओं का 80 प्रतिशत वहन करे
समिति ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं की कम से कम 80 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार द्वारा वहन किए जाने की सिफारिश की है। अन्य सहायता स्वरूपों के लिए, बिना बंधन वाली ब्लॉक ग्रांट्स का सुझाव दिया गया है। राज्यों को योजनाओं में चयन का विकल्प देने, स्वास्थ्य क्षेत्र में केंद्र की दखलअंदाजी न करने तथा केंद्रीय योजनाओं में राज्य भाषा के नामकरण के साथ सह-ब्रांडिंग का प्रस्ताव भी रिपोर्ट में शामिल है।
तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने संघ-राज्य संबंधों पर उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट का पहला भाग प्रस्तुत करते हुए राज्य स्वायत्तता और संघीय ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह दिन केवल तमिलनाडु के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के राज्यों और भारतीय संघ के लिए मार्गदर्शक ऐतिहासिक पहल का दिन है।राज्य अधिकारों की कमी पर चिंता
स्टालिन ने कहा कि राज्यों के पास जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। केंद्र सरकार सभी शक्तियों को अपने पास रखकर मनमाने ढंग से इस्तेमाल करती है और राज्यों का सम्मान नहीं करती। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कब तक राज्यों को केंद्र की कृपा पर निर्भर रहना पड़ेगा।
ऐतिहासिक संदर्भ और समितियाँमुख्यमंत्री ने अन्नादुरै और करुणानिधि के समय से चली आ रही राज्य स्वायत्तता की मांग को याद किया। उन्होंने राजमन्नार समिति (1971) से लेकर सरकारिया आयोग (1983), वेंकटचलैया आयोग (2000) और पूंची समिति (2004) तक की रिपोर्टों का उल्लेख किया, जिनमें संघीय संतुलन की आवश्यकता बताई गई थी, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई।वर्तमान संकट और समाधान
स्टालिन ने कहा कि आज केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों को लगातार छीन रही है—राज्य सूची के अधिकारों को समवर्ती सूची में डालकर, वित्तीय हिस्सेदारी घटाकर, जीएसटी और परिसीमन जैसी नीतियों से दबाव बनाकर, और हिंदी थोपकर। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन संकटों से निकलने का एकमात्र उपाय राज्य स्वायत्तता और संविधान संशोधन है।
संघवाद को संविधान में दर्ज करने की मांगमुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के एस.आर. बोम्मई मामले (1994) का हवाला देते हुए कहा कि संघवाद संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। उन्होंने मांग की कि इसे संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए और आवश्यक संशोधन किए जाएं। स्टालिन ने अंत में कहा, “राज्य मजबूत होंगे तभी भारत मजबूत होगा। राज्य स्वायत्तता कोई रियायत नहीं, बल्कि पूरे देश की सुरक्षा और विकास का आधार है।”