पुरुषावाक्कम स्थित श्री एमकेएम जैन मेमोरियल में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने जैनोलॉजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में युवाओं को अपने अन्तर की शक्ति को जागृत करने के लिए सामायिक सूत्र के प्रयोग बताते हुए कहा कि जो भी तप करें, अखंडित करें। जब नियम पालन अखंडि
चेन्नई।पुरुषावाक्कम स्थित श्री एमकेएम जैन मेमोरियल में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने जैनोलॉजी प्रेक्टिल लाइफ सत्र में युवाओं को अपने अन्तर की शक्ति को जागृत करने के लिए सामायिक सूत्र के प्रयोग बताते हुए कहा कि जो भी तप करें, अखंडित करें। जब नियम पालन अखंडित होगा तो प्रत्येक कर्म धर्म में परिवर्तित हो जाएगा।
प्रत्येक कर्म परमात्मा के स्मरण के साथ अपने मन, वचन, काया तीनों से आपनी आत्मा को अलग करके करें। सामायिक करते हुए हम सावध्य को रोकते हैं और बुरे विचारों को ग्रहण नहीं करते तो स्वयं की शक्ति का संचयन करते हैं। तीर्थंकरों की भावना आत्मकल्याण के साथ लोक कल्याण की होती है।
वे कर्मक्षय के साथ पुण्यों का उपार्जन भी करते हैं। कोई व्यक्ति एक बात कहे तो दूसरा नहीं मानता और वही बात कोई दूसरा कहे तो लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं, यह उस व्यक्ति के पुण्यों का प्रभाव होता है। इसी प्रकार तीर्थंकर परमात्मा एक ही भाषा में बोलते हैं लेकिन उनके वचनों को देव, मनुष्य, पशु, पक्षी सभी जीव समझते हैं कि परमात्मा मेरी ही भाषा में बात कर रहे हैं और मुझे ही समझा रहे हैं। सभी इसमें अपना समाधान पाते हैं और स्वीकार करते हैं। परमात्मा के एक-एक शब्द से कमल पुष्प बिखेरत हैं।
उनका मन, वचन, दृष्टि, काया व संपूर्ण जीवन ही कमल के समान और अलौकिक कांतिमय है। परमात्मा ने अपना ऐश्वर्य है जगत को मूलधर्म प्रदान करने और जगत का कल्याण करने में लगाया है। अहंकार आने पर नशा आता है और चापलूसों का घेरा व्यक्ति को घेरता जाता है और वह व्यक्ति अपनी मर्यादा व शालीनता को रौंद डालता है। इस प्रकार का अहंकार परमात्मा के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाता है।
आचार्य मानतुंग कहते हैं कि क्रोध में व्यक्ति को अपनी स्थिति को भूलकर अपनी सारी प्रतिष्ठा को बर्बाद कर देता है। मेरे मन में जब भी क्रोध की भावना आए तो परमात्मा के चरणों का आश्रय ले लें। परमात्मा में अन्तर के माया के दावानल को जला देने की क्षमता है।
तीर्थेशऋषि ने कहा कि अहिंसा का जीवन जीने वाले और धर्म में मन लगाने वाले को देवता भी नमन करते हैं। धर्म करते हुए भी धर्म की भावना मन में होनी चाहिए। धर्मभावना से व्यक्ति में दिव्यता प्रकट होती है। परमात्मा का ध्यान करते हुए जो भी कार्य करेंगे वह प्रत्येक क्रिया धर्म में बदल जाती है।