37 लाख रुपए की गड़बड़ी प्रमाणित होने और शत-प्रतिशत रिकवरी होने के बाद भी असली दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने से प्रशासन कतरा रहा है।
जिले में प्राकृतिक आपदा और सूखा राहत राशि के वितरण में हुए महाघोटाले की जांच अब सरकारी विभागों की आपसी खींचतान और विरोधाभासी बयानों के भंवर में फंस गई है। एक ओर जहां यह मामला विधानसभा में गूंज चुका है और राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने स्वयं धांधली स्वीकार की है, वहीं दूसरी ओर जिला स्तर पर अधिकारियों की नूराकुश्ती ने इस पूरी प्रक्रिया को तमाशा बना दिया है। आलम यह है कि 37 लाख रुपए की गड़बड़ी प्रमाणित होने और शत-प्रतिशत रिकवरी होने के बाद भी असली दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने से प्रशासन कतरा रहा है।
इस पूरे मामले में अब जिला प्रशासन के दो महत्वपूर्ण विभाग आमने-सामने आ गए हैं, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। छतरपुर तहसीलदार पीयूष दीक्षित का स्पष्ट कहना है कि उनकी तहसील से संबंधित जो भी जानकारी और अभिलेख जांच दल द्वारा मांगे गए थे, वे समय पर उपलब्ध करा दिए गए हैं और उनकी ओर से जांच में कोई बाधा नहीं है। इसके ठीक उलट, प्रभारी अधिकारी भू-अभिलेख रामराज गुप्ता का कहना है कि जिले के सभी तहसीलदारों ने अभी तक पूर्ण रिपोर्ट और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए हैं, इसी वजह से जांच को अंतिम रूप देने और दोषियों पर कार्रवाई करने में विलंब हो रहा है।
छतरपुर जिले में इस गड़बड़ी की कुल राशि 37.31 लाख रुपए आंकी गई थी। प्रशासन ने 100 प्रतिशत रिकवरी तो कर ली है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या रिकवरी हो जाना अपराध को खत्म कर देता है? घोटाले के मुख्य आरोपी तत्कालीन नाजिर शैलेन्द्र हिमांचल को निलंबित कर बर्खास्तगी का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन सिस्टम की मेहरबानी देखिए कि नाजिर की अपील पर संभाग कमिश्नर ने बर्खास्तगी से राहत दे दी और निलंबन भी बहाल कर दिया। यानी करोड़ों का हेरफेर करने वाले अब फिर से पद पर लौट आए हैं।
जांच में उन नामों का खुलासा हुआ है जो किसी भी श्रेणी में 'पात्र किसान' नहीं थे, फिर भी उनके खातों में लाखों रुपये की राहत राशि भेजी गई। इन नामों में वैभव खरे, बुंदेलखंड विकास निधि लिमिटेड, रोहित प्रभाकर, लैला अहिरवार, राजेन्द्र राजपूत, अजय कुमार नाहर, मनोज कुशवाह, बबीता अहिरवार, नत्थू अहिरवार, मीरा तिवारी, चंद्रप्रकाश तिवारी, अभिलाषा कुशवाह, रविशंकर रावत, कौशलेन्द्र वर्मा, लीला अहिरवार, सचिन रावत, हिरदासा रावत, यश रावत और नरेंद्र कुमार जैसे नाम शामिल हैं। ये वे अपात्र चेहरे हैं जिन्होंने वास्तविक पीडि़त किसानों का हक मारा और प्रशासन अब तक इनके पीछे खड़े मास्टरमाइंड पर हाथ डालने से बच रहा है।
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच प्रदेश के 20 जिलों में राहत राशि के 288 प्रकरणों में कुल 27.90 करोड़ रुपए का गबन हुआ। पूरे प्रदेश में केवल 7.43 करोड़ रुपए की ही वसूली हो सकी है। हालांकि छतरपुर, मंदसौर, रायसेन और सतना जैसे जिलों में 100 प्रतिशत रिकवरी दिखाई गई है, लेकिन इन सभी जिलों में दोषियों पर फौजदारी कार्रवाई न होना प्रशासन की नीयत पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा उठाए गए इस मुद्दे पर मंत्री के आश्वासन के बावजूद छतरपुर में जांच को जानबूझकर लंबित रखा गया है। आक्रोशित किसानों ने अब अल्टीमेटम दिया है कि यदि जल्द ही दोषियों को जेल नहीं भेजा गया, तो वे राजधानी भोपाल में जाकर प्रदर्शन करेंगे।